इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने दिव्यांग अभ्यर्थियों से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि मेडिकल असेसमेंट बोर्ड किसी सक्षम प्राधिकारी की ओर से जारी वैध दिव्यांगता प्रमाण पत्र में दर्ज दिव्यांगता प्रतिशत को अपनी तरफ से बदल नहीं सकता। कोर्ट ने कहा कि प्रमाण पत्र में दर्ज दिव्यांगता का प्रतिशत तब तक मान्य रहेगा, जब तक उसे कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी या वैधानिक प्रक्रिया के जरिए बदला या रद्द नहीं किया जाता।
मामला एमबीबीएस में प्रवेश लेने वाले तीन अभ्यर्थियों से जुड़ा था। इन अभ्यर्थियों के पास सक्षम चिकित्सा प्राधिकारी की ओर से जारी दिव्यांगता प्रमाण पत्र थे। एक मामले में अभ्यर्थी को 45 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता का प्रमाण पत्र जारी किया गया था, लेकिन बाद में एनएमसी के मेडिकल असेसमेंट बोर्ड ने इसे घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया। इसके आधार पर उसे पीडब्ल्यूबीडी यानी दिव्यांगजन आरक्षण के लिए अयोग्य माना गया। अपीलीय मेडिकल बोर्ड ने भी इस फैसले को बरकरार रखा था।
मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड और अपीलीय बोर्ड के इन निष्कर्षों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी करने वाले सक्षम प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र को मेडिकल असेसमेंट बोर्ड अपनी जांच के आधार पर बदल नहीं सकता। कोर्ट ने आरपीडब्ल्यूडी एक्ट, 2016 की धारा 57 का उल्लेख करते हुए कहा कि सक्षम प्राधिकारी की ओर से जारी प्रमाण पत्र को कानूनी प्रक्रिया के बिना बदला नहीं जा सकता।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि मेडिकल असेसमेंट बोर्ड की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं होती। एमबीबीएस जैसे मेडिकल कोर्स में बोर्ड यह जांच कर सकता है कि अभ्यर्थी अपनी दिव्यांगता के बावजूद उचित सुविधाओं, रीजनेबल अकॉमोडेशन और सहायक तकनीक की मदद से पढ़ाई पूरी करने में सक्षम है या नहीं। लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान पहले से जारी प्रमाण पत्र में दर्ज दिव्यांगता प्रतिशत को बदलना बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं है।
हाईकोर्ट के इस फैसले से संबंधित अभ्यर्थियों को राहत मिली है। कोर्ट के निर्देश के बाद उन्हें नीट-यूजी 2026 की बची हुई काउंसलिंग में पीडब्ल्यूबीडी आरक्षित श्रेणी के तहत शामिल किए जाने का रास्ता साफ हुआ है। इस फैसले से यह बात स्पष्ट होती है कि दिव्यांगता प्रमाण पत्र की वैधता और मेडिकल कोर्स में अभ्यर्थी की कार्यात्मक क्षमता, दोनों अलग-अलग पहलू हैं और मेडिकल बोर्ड को इनकी सीमाओं के भीतर ही काम करना होगा।




