कश्मीर को लेकर तुर्की और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के एक समूह की ओर से दिए गए बयान के बाद भारत और इन देशों के बीच कूटनीतिक मतभेद एक बार फिर सामने आए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान कश्मीर का मुद्दा चर्चा में आया। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने दक्षिण एशिया में कश्मीर समेत विवादित मुद्दों के समाधान के लिए बातचीत और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत रास्ता निकालने की बात कही।
इसी दौरान OIC के जम्मू-कश्मीर संपर्क समूह की भी बैठक हुई। इस समूह में पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब, अजरबैजान और नाइजर शामिल हैं। बैठक के बाद जारी बयान में कश्मीर के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया गया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों तथा अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला दिया गया। समूह ने जम्मू-कश्मीर की स्थिति को लेकर अपनी चिंता भी जाहिर की।
भारत ने OIC के इस बयान को खारिज करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं। भारत का कहना है कि OIC को भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है। नई दिल्ली ने OIC के बयान को अनुचित और तथ्यों के विपरीत बताया। भारत ने यह भी कहा कि पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने के लिए OIC का इस्तेमाल करता रहा है।
दरअसल, कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान की स्थिति लंबे समय से बिल्कुल अलग रही है। भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय स्तर पर सुलझाए जाने चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है। वहीं पाकिस्तान कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दे के रूप में उठाता रहा है और कुछ मुस्लिम देश भी इस मुद्दे पर पाकिस्तान के पक्ष में बयान देते रहे हैं।
तुर्की का कश्मीर पर यह रुख नया नहीं है। राष्ट्रपति एर्दोगन पहले भी कश्मीर के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत की जरूरत की बात कर चुके हैं। भारत लगातार तुर्की से अपने आंतरिक मामलों पर टिप्पणी से बचने और क्षेत्रीय परिस्थितियों को संतुलित तरीके से देखने की अपील करता रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम का मतलब यह है कि कश्मीर का मुद्दा अब भी भारत की विदेश नीति और पाकिस्तान के साथ उसके संबंधों में एक संवेदनशील विषय बना हुआ है। OIC के संपर्क समूह और तुर्की के बयानों से जहां पाकिस्तान को कूटनीतिक समर्थन मिलता दिखाई देता है, वहीं भारत ऐसे बयानों को अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानकर खारिज करता है। ऐसे में कश्मीर को लेकर दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक मतभेद आगे भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिखाई दे सकते हैं।





