OBC क्रीमी लेयर विवाद में फंसी सरकार, सुप्रीम कोर्ट और CAT के आदेशों के बीच बढ़ी उलझन

OBC क्रीमी लेयर के नियमों को लेकर केंद्र सरकार के सामने एक नई कानूनी चुनौती खड़ी हो गई है। मामला उन OBC उम्मीदवारों से जुड़ा है, जिन्हें उनके माता-पिता की नौकरी और वेतन के आधार पर क्रीमी लेयर में रखकर आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया था। 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केवल माता-पिता की सैलरी को आधार बनाकर किसी OBC उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में नहीं रखा जा सकता। माता-पिता के पद और उनकी सामाजिक स्थिति जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा। इस फैसले का असर खास तौर पर PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले अभिभावकों के बच्चों से जुड़े मामलों पर पड़ता है।

इस विवाद की जड़ 1993 के क्रीमी लेयर नियमों और 2004 में DoPT की ओर से जारी स्पष्टीकरण से जुड़ी है। 2004 के स्पष्टीकरण में PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की सैलरी को भी क्रीमी लेयर तय करने के लिए आधार बनाया गया था। इसके बाद सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले करीब 100 OBC उम्मीदवारों के दावे क्रीमी लेयर के आधार पर खारिज किए गए। इन उम्मीदवारों में से कई ने अदालतों का रुख किया। उनका तर्क था कि सरकारी कर्मचारियों और PSU या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के लिए अलग-अलग तरीके से नियम लागू करना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट के मार्च के फैसले के बाद अब सबसे बड़ा सवाल इस फैसले को किस समय से लागू किया जाए, इसे लेकर है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से CSE-2025 समेत पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं पर फैसले के प्रभाव को स्पष्ट करने की मांग की है। सरकार का कहना है कि CSE-2025 का अंतिम परिणाम सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले से पांच दिन पहले ही जारी हो चुका था। ऐसे में यदि चयन प्रक्रिया को दोबारा खोला जाता है तो सेवा आवंटन, प्रशिक्षण, कैडर, वरिष्ठता और वेतन निर्धारण जैसी व्यवस्थाओं पर असर पड़ सकता है।

इस बीच सरकार की स्थिति सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) में अलग-अलग दिखाई देने से मामला और जटिल हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, CAT के सामने केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने की बात कही थी, जबकि बाद में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में सरकार ने फैसले के पूर्व प्रभाव और उसके लागू होने के तरीके को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। अब केंद्र इस कानूनी स्थिति को स्पष्ट करने की कोशिश कर रहा है, ताकि प्रभावित उम्मीदवारों के अधिकारों और पहले से पूरी हो चुकी भर्ती प्रक्रियाओं—दोनों को लेकर आगे की स्थिति साफ हो सके।

फिलहाल इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। अदालत के स्पष्टीकरण से यह तय होगा कि मार्च 2026 के फैसले का प्रभाव पुराने चयन मामलों और CSE-2025 पर किस तरह पड़ेगा। साथ ही, PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले अभिभावकों के बच्चों के लिए क्रीमी लेयर तय करने का स्पष्ट तरीका भी आगे की नीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।