Electoral Roll Discrepancies: वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों को लेकर बढ़ी चिंता, ECI ने प्रक्रिया में किए बदलाव

भारत में Electoral Roll यानी मतदाता सूची में सामने आ रही विसंगतियों को लेकर इन दिनों चुनावी प्रक्रिया पर चर्चा तेज है। 2026 में चल रहे Special Intensive Revision यानी SIR के दौरान कई राज्यों में पुराने और मौजूदा मतदाता रिकॉर्ड के बीच नाम, उम्र, रिश्तेदारों की जानकारी और अन्य विवरणों में अंतर सामने आया है। चुनाव आयोग के अनुसार, ऐसी विसंगतियां अपने आप में किसी मतदाता को अपात्र घोषित नहीं करतीं, बल्कि रिकॉर्ड के सत्यापन की जरूरत बताती हैं।

दिल्ली में SIR के दौरान 33 लाख से अधिक मतदाताओं को अलग-अलग कारणों से नोटिस जारी किए गए। इनमें कुछ रिकॉर्ड पिछले SIR से मैप नहीं हो पाए, जबकि कुछ में “logical discrepancies” यानी मौजूदा और पुराने रिकॉर्ड के बीच तार्किक अंतर पाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर को इन नोटिसों की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा था कि कुछ मामलों में नोटिस “mechanically” जारी किए गए प्रतीत होते हैं और चुनाव आयोग से प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए अतिरिक्त फिल्टर पर विचार करने को कहा था।

महाराष्ट्र में भी लाखों मतदाता रिकॉर्ड सत्यापन के दायरे में आए हैं। राज्य के ड्राफ्ट SIR डेटा के अनुसार, करीब 62.48 लाख रिकॉर्ड में रिश्तेदारों की जानकारी में विसंगतियां पाई गईं, जबकि लगभग 59.76 लाख मतदाताओं का पिछली मतदाता सूची में किसी रिश्तेदार से लिंक स्थापित नहीं हो पाया। चुनाव आयोग की प्रक्रिया के तहत इन मामलों में संबंधित मतदाताओं को अपनी पात्रता साबित करने और आवश्यक दस्तावेज देने का अवसर दिया जाना है। इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि इतने मतदाता अपात्र पाए गए हैं या उनके नाम स्वतः हटाए जाएंगे।तकनीकी प्रणाली को लेकर भी सवाल उठे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, ERONet और ECINet पुराने और नए रिकॉर्ड को मिलाने में नामों की स्पेलिंग, उम्र, पारिवारिक विवरण और अलग-अलग भाषाओं में दर्ज रिकॉर्ड के अंतर को पकड़ते हैं। खासकर पुराने रिकॉर्ड क्षेत्रीय भाषाओं में होने के कारण transliteration और spelling differences से mismatches पैदा हो सकते हैं। चुनाव आयोग ने तकनीकी प्रणाली में खामियों को स्वीकार करने के बजाय इसे बड़े स्तर पर रिकॉर्ड सत्यापन के लिए आवश्यक प्रणाली बताया है और सुधार की प्रक्रिया जारी रखने की बात कही है।गोवा में सामने आया मामला तकनीकी विसंगतियों की गंभीरता को लेकर चर्चा में रहा। SIR के दौरान 97 मतदाताओं को “logical discrepancies” के आधार पर अंतिम सूची से बाहर कर दिया गया था, लेकिन बाद में अधिकारियों ने जांच के बाद उन्हें पात्र पाया। रिपोर्ट के अनुसार, उस समय ECINet में पहले किए गए deletion को वापस लेने यानी rollback करने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। चुनाव आयोग ने बाद में इस मामले में प्रक्रिया और सॉफ्टवेयर से जुड़े स्पष्टीकरण दिए। 26 सितंबर को आयोग ने कहा कि गोवा में इन 97 में से 81 मतदाता Form 6 के जरिए दोबारा शामिल होने की प्रक्रिया पूरी कर चुके हैं।कर्नाटक में भी मतदाता सूची के आंकड़ों में अंतर सामने आया है। 26 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, SIR के ड्राफ्ट डेटा में 67,307 Form-7 आवेदन दर्ज थे, जबकि राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय द्वारा बाद में साझा किए गए डेटा में 61,130 Form-7 आवेदन बताए गए। लगभग 6,000 के इस अंतर को अधिकारियों ने स्वीकार किया है और कहा है कि आंकड़ों का विस्तृत सत्यापन किया जाएगा।

इन घटनाक्रमों के बीच चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को SIR प्रक्रिया में कुछ बदलावों की घोषणा की। अब “unmapped” या “logical discrepancy” वाले नोटिस पाने वाले मतदाताओं को सामान्य परिस्थितियों में ERO के सामने व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाने के बजाय BLO उनके घर जाकर दस्तावेज एकत्र करेंगे। सुनवाई केवल असाधारण परिस्थितियों में होगी और उसे प्राथमिकता के आधार पर ऑनलाइन आयोजित किया जा सकता है। आयोग ने दिल्ली और महाराष्ट्र में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा भी बढ़ाई है।

फिलहाल Electoral Roll discrepancies से जुड़े मामलों में अंतिम स्थिति संबंधित राज्य की SIR प्रक्रिया, दस्तावेजों के सत्यापन और दावे-आपत्तियों के निपटारे के बाद स्पष्ट होगी। चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि जिन लोगों का नाम SIR के दौरान छूट गया है, वे निरंतर मतदाता सूची अपडेट प्रक्रिया के तहत संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के पास नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।