सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय वायुसेना की पूर्व अधिकारी और बलिदानी की पत्नी को बड़ी राहत देते हुए उन्हें दोबारा वायुसेना में शामिल करने का आदेश दिया है। अदालत ने अपने विशेष संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कहा कि इस मामले की असाधारण परिस्थितियों में उनके दिवंगत पति की देश के लिए सेवा और बलिदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मामला भारतीय वायुसेना की पूर्व अधिकारी प्रियंका सक्सेना से जुड़ा है। उन्हें साल 2003 में वायुसेना की लॉजिस्टिक्स ब्रांच में कमीशन मिला था। उन्होंने करीब 10 साल तक सेवा की और दिसंबर 2013 में शॉर्ट सर्विस कमीशन की अवधि पूरी होने के बाद वायुसेना छोड़ दी थी। उस समय उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियों और अपने फाइटर पायलट पति के साथ रहने के लिए आगे सेवा जारी नहीं रखने का फैसला किया था।
इसके बाद 24 दिसंबर 2021 को उनके पति विंग कमांडर हर्षित सिन्हा की जैसलमेर एयरफील्ड के पास MiG-21 Bison विमान हादसे में मौत हो गई। पति की मौत के बाद प्रियंका ने अपने पुराने सैन्य अनुभव और सेवा को देखते हुए दोबारा वायुसेना में शामिल होने की इच्छा जताई। हालांकि, उम्र और उस समय लागू नियमों के आधार पर उनकी मांग स्वीकार नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण का रुख किया, लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर अदालत ने उनकी परिस्थितियों को सामान्य मामलों से अलग माना। कोर्ट ने कहा कि प्रियंका पहले करीब एक दशक तक वायुसेना में सेवा दे चुकी हैं और उनके पति ने भी देश की सेवा करते हुए अपनी जान गंवाई। अदालत ने यह भी माना कि मौजूदा नीति में उनके जैसे विशेष मामले के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, प्रियंका को वायुसेना के अगले उपलब्ध कोर्स में एक साल की रिफ्रेशर ट्रेनिंग करनी होगी और निर्धारित मेडिकल मानकों को पूरा करना होगा। इन शर्तों को पूरा करने के बाद उन्हें स्क्वाड्रन लीडर के पद पर दोबारा सेवा में लिया जाएगा। उनकी पिछली 10 साल की सेवा को भी सेवा अवधि में शामिल किया जाएगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्हें नियमों के अनुसार शॉर्ट सर्विस कमीशन में चार साल का विस्तार दिया जाएगा। इसके अलावा, उन्हें स्थायी कमीशन और आगे पदोन्नति के लिए भी नियमानुसार विचार किया जाएगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश प्रियंका सक्सेना के मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए दिया गया है और इसे सभी समान मामलों पर लागू होने वाली सामान्य मिसाल नहीं माना जाएगा।





