अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं। 18 सितंबर 2026 को ब्रेंट क्रूड करीब 102.53 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि अमेरिकी WTI करीब 100.04 डॉलर प्रति बैरल रहा। हालांकि शुक्रवार को कीमतों में करीब 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई से जुड़ी चिंताओं के कारण तेल बाजार में अस्थिरता बनी हुई है।भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने पर भारत का आयात बिल बढ़ता है और डॉलर की मांग पर भी दबाव आता है। सितंबर में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत भी 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहने की रिपोर्ट सामने आई है।
हालांकि कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत बढ़ जाएंगे। 18 सितंबर को दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई समेत प्रमुख शहरों में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ। घरेलू ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय क्रूड के अलावा रुपये-डॉलर की विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत, टैक्स और तेल कंपनियों के मार्जिन जैसे कई कारकों पर निर्भर करती हैं।फिलहाल ऊंचे क्रूड का दबाव तेल मार्केटिंग कंपनियों पर ज्यादा दिखाई दे रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, अगर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं और घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रहती हैं, तो कंपनियों के मार्केटिंग मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। सितंबर में पेट्रोल और डीजल पर कंपनियों के मार्जिन में नुकसान की स्थिति बनने का अनुमान भी लगाया गया है।

अगर महंगा कच्चा तेल लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन लागत बढ़ने से माल ढुलाई महंगी हो सकती है, जिसका असर कई वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। साथ ही, महंगे तेल से भारत का व्यापार घाटा और आयात बिल बढ़ने का दबाव बन सकता है। दूसरी ओर, कमजोर रुपये के साथ महंगा कच्चा तेल भारत के लिए और अधिक महंगा पड़ सकता है।आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों की दिशा मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय क्रूड की कीमत, पश्चिम एशिया में सप्लाई की स्थिति, रुपये की विनिमय दर और घरेलू ईंधन मूल्य निर्धारण पर निर्भर करेगी। फिलहाल 100 डॉलर से ऊपर का क्रूड भारत के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक चुनौती है, लेकिन इसका पूरा असर उपभोक्ताओं तक कब और कितना पहुंचेगा, यह इन सभी कारकों पर निर्भर करेगा।





