भारत का सेमीकंडक्टर मिशन: Semicon 2.0 से चिप मैन्युफैक्चरिंग में आएगा बड़ा बदलाव

भारत अपने सेमीकंडक्टर सेक्टर को मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। नई दिल्ली में 17 से 19 सितंबर तक आयोजित हो रहे SEMICON India 2026 के दौरान देश के सेमीकंडक्टर मिशन के अगले चरण पर खास जोर दिया गया है। सरकार ने जुलाई 2026 में Semicon 2.0 को मंजूरी दी थी, जिसके लिए ₹1,27,500 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस चरण का उद्देश्य भारत में चिप निर्माण के साथ-साथ पूरी सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन को विकसित करना है।Semicon 2.0 के तहत चिप डिजाइन, सेमीकंडक्टर मशीनरी और सामग्री, नई फैब यूनिट्स, एडवांस्ड पैकेजिंग, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और प्रतिभा विकास जैसे क्षेत्रों पर ध्यान दिया जा रहा है। यानी सरकार केवल चिप बनाने वाली फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि कच्चे माल से लेकर डिजाइन और तैयार चिप तक पूरा इकोसिस्टम भारत में विकसित करने की कोशिश कर रही है।

इस दिशा में निवेश की घोषणाएं भी सामने आई हैं। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, Semicon 2.0 के तहत कंपनियों ने करीब 11–12 अरब डॉलर यानी लगभग ₹1 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव दिए हैं। इन प्रस्तावों में सेमीकंडक्टर उपकरण, सामग्री, गैस, केमिकल और सब्सट्रेट जैसे क्षेत्र शामिल हैं।इसी बीच अमेरिकी सेमीकंडक्टर उपकरण कंपनी Applied Materials ने भारत में अगले 10 वर्षों में 5 अरब डॉलर निवेश करने की योजना की घोषणा की है। कंपनी के अनुसार यह निवेश रिसर्च, सप्लाई चेन और वर्कफोर्स के विस्तार पर केंद्रित होगा। SEMICON India 2026 में 52 देशों की 600 से अधिक कंपनियों की भागीदारी भारत के सेमीकंडक्टर सेक्टर में बढ़ती वैश्विक दिलचस्पी को भी दिखाती है।

भारत के लिए सेमीकंडक्टर क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चिप्स आज स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, दूरसंचार, रक्षा और आधुनिक उद्योगों का अहम हिस्सा हैं। सरकार के अनुसार भारत में पांच सेमीकंडक्टर यूनिट्स ने कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू कर दिया है। अब Semicon 2.0 के जरिए देश का लक्ष्य इस आधार को और विस्तृत करके एक मजबूत और व्यापक घरेलू चिप इकोसिस्टम तैयार करना है।कुल मिलाकर, Semicon 2.0 भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बढ़ाने की एक बड़ी पहल है। आने वाले वर्षों में इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निवेश कितनी तेजी से वास्तविक परियोजनाओं में बदलते हैं, उत्पादन क्षमता कितनी बढ़ती है और भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में कितनी मजबूत भूमिका बना पाता है।