65 साल तक एक-दूसरे का हाथ थामकर जिंदगी बिताने वाले इस बुजुर्ग दंपती ने अपने जीवन के आखिरी पड़ाव पर भी साथ रहने का फैसला किया। दोनों की सबसे गहरी इच्छा थी कि उनमें से किसी एक को दूसरे के जाने के बाद अकेलेपन का सामना न करना पड़े। इसी भावनात्मक जुड़ाव के बीच उन्होंने इच्छामृत्यु का रास्ता चुना, ताकि दोनों को एक-दूसरे के बिना जीवन के अंतिम दौर से न गुजरना पड़े।
बताया जाता है कि शादी के 65 वर्षों में इस कपल ने जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव साथ देखे। खुशियों से लेकर मुश्किल हालात तक, दोनों हमेशा एक-दूसरे के साथ खड़े रहे। उम्र बढ़ने के साथ उनका रिश्ता और भी गहरा होता गया और एक-दूसरे की मौजूदगी उनके लिए भावनात्मक सहारे का सबसे बड़ा जरिया बन गई।
उनके लिए सबसे बड़ा डर यह था कि अगर पहले किसी एक की मौत हो गई, तो पीछे रहने वाले साथी को अचानक एक ऐसी जिंदगी जीनी पड़ेगी जिसमें उसका सबसे करीबी इंसान मौजूद नहीं होगा। दशकों तक साथ रहने के बाद अकेलेपन की यह संभावना दोनों के लिए बेहद मुश्किल थी। इसी वजह से उन्होंने अपने जीवन के अंतिम फैसले को भी एक साथ लेने की इच्छा जताई।
उनकी कहानी सामने आने के बाद यह मामला लोगों के बीच भावनात्मक चर्चा का विषय बन गया। कई लोगों के लिए यह 65 साल पुराने रिश्ते की गहराई और एक-दूसरे के प्रति समर्पण की मिसाल है, जबकि कुछ लोगों के लिए यह इच्छामृत्यु, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के अंतिम चरण में लिए जाने वाले फैसलों से जुड़े गंभीर सवाल भी खड़े करता है।
इच्छामृत्यु को लेकर दुनिया के अलग-अलग देशों में कानून अलग हैं। कुछ जगहों पर कड़ी चिकित्सकीय और कानूनी शर्तों के तहत इसकी अनुमति है, जबकि कई देशों में इसे कानूनी मान्यता नहीं मिली है। ऐसे मामलों में व्यक्ति की इच्छा, उसकी चिकित्सकीय स्थिति और कानूनी प्रक्रिया जैसे कई पहलुओं पर विचार किया जाता है।इस दंपती की कहानी इसलिए भी अलग है क्योंकि करीब छह दशक से ज्यादा समय तक साथ रहने के बाद उन्होंने अपने जीवन की अंतिम इच्छा भी एक-दूसरे के साथ जुड़ी रखी। उनके लिए साथ होना सिर्फ शादी का रिश्ता नहीं था, बल्कि उनकी पूरी जिंदगी की पहचान बन चुका था।
65 साल की साझी जिंदगी के बाद उनका यह फैसला एक गहरी भावनात्मक कहानी कहता है—जिस इंसान के साथ पूरी जिंदगी बिताई, उसके बिना जीवन की कल्पना करना उनके लिए इतना कठिन था कि उन्होंने अंतिम विदाई भी साथ चुनने का फैसला किया।





