बनारसी बुनाई को मिला राष्ट्रीय सम्मान, शाह मुहम्मद अंसारी को ‘संत कबीर हथकरघा पुरस्कार’ से नवाजा गया

उत्तर प्रदेश के वाराणसी की विश्वप्रसिद्ध बनारसी बुनाई को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर गौरव हासिल हुआ है। पारंपरिक हथकरघा कला को नई पहचान दिलाने वाले प्रख्यात बुनकर शाह मुहम्मद अंसारी को भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित ‘संत कबीर हथकरघा पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार उन्हें बनारसी हथकरघा उद्योग में उनके उत्कृष्ट योगदान, वर्षों की मेहनत, पारंपरिक शिल्प को संरक्षित रखने और नई पीढ़ी तक इस विरासत को पहुंचाने के लिए प्रदान किया गया। इस उपलब्धि से न केवल शाह मुहम्मद अंसारी का नाम रोशन हुआ है, बल्कि पूरे वाराणसी के बुनकर समुदाय में खुशी और गर्व का माहौल है।

शाह मुहम्मद अंसारी कई दशकों से बनारसी साड़ियों और पारंपरिक वस्त्रों की बुनाई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने अपनी मेहनत, लगन और बारीक कारीगरी के दम पर बनारसी वस्त्रों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी बनाई गई साड़ियों और कपड़ों में पारंपरिक भारतीय डिजाइनों के साथ आधुनिक शैली का भी सुंदर समावेश देखने को मिलता है। यही कारण है कि उनके उत्पाद देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी काफी पसंद किए जाते हैं।

संत कबीर हथकरघा पुरस्कार’ देश के सबसे प्रतिष्ठित हथकरघा सम्मानों में से एक माना जाता है। यह सम्मान उन बुनकरों और शिल्पकारों को दिया जाता है जिन्होंने भारतीय हथकरघा उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में उल्लेखनीय योगदान दिया हो। यह पुरस्कार केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का सम्मान नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक हस्तशिल्प के संरक्षण का भी प्रतीक माना जाता है।

सम्मान प्राप्त करने के बाद शाह मुहम्मद अंसारी ने कहा कि यह पुरस्कार केवल उनके लिए नहीं, बल्कि वाराणसी के हजारों बुनकर परिवारों की मेहनत और समर्पण का सम्मान है। उन्होंने कहा कि बनारसी बुनाई केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक सांस्कृतिक विरासत है, जिसे जीवित रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने युवाओं से भी अपील की कि वे आधुनिक तकनीक के साथ-साथ पारंपरिक हथकरघा कला को अपनाएं, ताकि यह विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके।

वाराणसी की बनारसी साड़ियां अपनी महीन कारीगरी, जरी के काम, रेशमी धागों और आकर्षक डिजाइनों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। इन साड़ियों को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग भी प्राप्त है, जिससे उनकी विशिष्ट पहचान और गुणवत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है। हालांकि बदलते समय, मशीनों से बनने वाले सस्ते उत्पादों और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण पारंपरिक बुनकरों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में इस प्रकार के राष्ट्रीय सम्मान बुनकरों का मनोबल बढ़ाने और इस कला को नई ऊर्जा देने का कार्य करते हैं।

हथकरघा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पारंपरिक बुनकरों को आधुनिक तकनीक, बेहतर बाजार, प्रशिक्षण और सरकारी योजनाओं का निरंतर लाभ मिलता रहे तो भारत का हथकरघा उद्योग वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूत हो सकता है। शाह मुहम्मद अंसारी की यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि समर्पण, कौशल और परंपरा के प्रति सम्मान के बल पर भारतीय शिल्पकार आज भी विश्वभर में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। उनका सम्मान न केवल बनारसी बुनाई की प्रतिष्ठा को बढ़ाता है, बल्कि देशभर के लाखों बुनकरों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनता है।