मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और तेल आपूर्ति मार्गों पर बढ़ते खतरों के बीच एक पुरानी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण तेल पाइपलाइन फिर चर्चा में आ गई है। यह वही ट्रांस-इज़राइल (इलात–अश्केलोन) पाइपलाइन है, जिसे 1968 में ईरान और इज़राइल ने संयुक्त रूप से उस समय बनाया था, जब दोनों देशों के बीच घनिष्ठ संबंध थे। इस परियोजना का उद्देश्य ईरान के तेल को लाल सागर के रास्ते भूमध्य सागर तक पहुंचाकर यूरोपीय बाजारों में तेजी से निर्यात करना था। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के संबंध टूट गए और यह पाइपलाइन वर्षों तक विवाद और गोपनीयता का विषय बनी रही।
अब बदलते हालात में यह पाइपलाइन एक बार फिर रणनीतिक महत्व हासिल करती दिखाई दे रही है। हाल के महीनों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ और लाल सागर में बढ़ते सुरक्षा जोखिमों ने खाड़ी देशों की तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। ऐसे में इज़राइल के ऊर्जा मंत्री ने सुझाव दिया है कि भविष्य में सऊदी अरब से तेल को लाल सागर स्थित इलात तक लाकर, वहां से ट्रांस-इज़राइल पाइपलाइन के माध्यम से भूमध्य सागर के अश्केलोन बंदरगाह तक पहुंचाया जा सकता है। इससे तेल यूरोप तक बिना होर्मुज़ जलडमरूमध्य और लाल सागर के जोखिमपूर्ण समुद्री मार्गों पर निर्भर हुए पहुंच सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय राजनीतिक परिस्थितियां अनुकूल होती हैं और आवश्यक कूटनीतिक सहमति बनती है, तो यह मार्ग सऊदी अरब सहित अन्य खाड़ी देशों के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक निर्यात कॉरिडोर बन सकता है। हालांकि वर्तमान समय में सऊदी अरब और इज़राइल के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित नहीं हैं, इसलिए इस तरह की किसी भी परियोजना का भविष्य पूरी तरह क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
इसी बीच सऊदी अरब भी अपने पूर्व-पश्चिम (East-West) तेल पाइपलाइन नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने की योजना पर विचार कर रहा है, ताकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम की जा सके। रिपोर्टों के अनुसार, इस विस्तार का लाभ भविष्य में कुवैत, बहरीन और कतर जैसे पड़ोसी देशों को भी मिल सकता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा हालात ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल समुद्री मार्गों पर निर्भर रहना अब पहले जितना सुरक्षित नहीं है। इसी कारण मध्य पूर्व के देश वैकल्पिक पाइपलाइन नेटवर्क, नए निर्यात मार्गों और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक निवेश कर रहे हैं। यदि भविष्य में राजनीतिक और कूटनीतिक बाधाएं दूर होती हैं, तो दशकों पहले ईरान और इज़राइल द्वारा बनाई गई यह गुप्त पाइपलाइन क्षेत्र की ऊर्जा रणनीति में एक बार फिर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।




