3भारतीय रुपया हाल के दिनों में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दबाव में रहा है। 17 सितंबर को कारोबार के दौरान रुपया पहली बार ₹96.10 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया, हालांकि बाद में सुधार के साथ यह ₹95.89 पर बंद हुआ। 18 सितंबर को भी रुपया करीब ₹95.78 प्रति डॉलर पर कारोबार कर रहा था।रुपये में कमजोरी के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण बताए जा रहे हैं। इनमें कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, अमेरिकी डॉलर की मजबूती, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर में बढ़ोतरी प्रमुख हैं। अमेरिकी फेड ने 16 सितंबर को ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की, जिसके बाद डॉलर पर दबाव बढ़ा और उभरते बाजारों की मुद्राओं में अस्थिरता देखने को मिली।
रुपये की कमजोरी का सबसे सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में डॉलर महंगा होने पर समान मात्रा में तेल खरीदने के लिए भारतीय कंपनियों को अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं। मौजूदा समय में यह चिंता और बढ़ जाती है क्योंकि ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है। अगस्त में भारत के कच्चे तेल के आयात की मात्रा सालाना आधार पर 3 प्रतिशत घटी, लेकिन आयात बिल 18 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया।कमजोर रुपया महंगे आयात के जरिए महंगाई पर भी असर डाल सकता है। पेट्रोलियम के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कुछ औद्योगिक कच्चे माल और अन्य डॉलर आधारित आयात महंगे हो सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, निर्यातकों को कमजोर रुपये से कुछ लाभ मिल सकता है, क्योंकि विदेशों में मिलने वाली डॉलर आय को रुपये में बदलने पर अधिक रकम प्राप्त होती है। हालांकि, इसका वास्तविक फायदा इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित उद्योग आयातित कच्चे माल पर कितना निर्भर है।

विदेशी निवेश के लिहाज से भी रुपये की चाल महत्वपूर्ण है। डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट से विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय परिसंपत्तियों से मिलने वाला डॉलर-आधारित रिटर्न प्रभावित हो सकता है। हाल के दिनों में विदेशी फंडों की निकासी भी रुपये पर दबाव डालने वाले कारकों में शामिल रही है।रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भी रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को सीमित करने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। 16 सितंबर को Reuters ने कारोबारियों के हवाले से बताया था कि सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री संभवतः RBI की ओर से की गई थी।कुल मिलाकर, ₹96 के आसपास रुपये की स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतक है। इसका असर आयात लागत, महंगाई, विदेशी निवेश और व्यापार संतुलन पर पड़ सकता है, जबकि निर्यात क्षेत्र को कुछ राहत मिल सकती है। आगे रुपये की दिशा काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी ब्याज दरों, डॉलर की मजबूती और विदेशी पूंजी के प्रवाह जैसे कारकों पर निर्भर करेगी।





