लखनऊ: उत्तर प्रदेश में जमीन के इस्तेमाल से जुड़े नियमों को आसान बनाने की दिशा में योगी सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में भू-उपयोग परिवर्तन (Land Use Change) की प्रक्रिया को सरल करने और इसके लिए लगने वाले शुल्क में 50 प्रतिशत तक की कटौती को मंजूरी दी गई है। सरकार के इस फैसले से उन लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो कृषि भूमि का इस्तेमाल आवासीय, औद्योगिक, व्यावसायिक या अन्य स्वीकृत उपयोग के लिए करना चाहते हैं। इसका उद्देश्य भूमि संबंधी प्रक्रियाओं को आसान बनाने के साथ-साथ निवेश और विकास परियोजनाओं को गति देना भी है।
फैसले के तहत 6000 वर्गमीटर तक की जमीन के भू-उपयोग परिवर्तन का अधिकार संबंधित विकास प्राधिकरणों को दिया गया है। पहले ऐसे मामलों में राज्य सरकार के स्तर पर अनुमति की आवश्यकता होती थी, जिससे प्रक्रिया में अधिक समय लग सकता था। अब निर्धारित सीमा तक के मामलों का फैसला विकास प्राधिकरण अपने स्तर पर कर सकेंगे। इससे आवेदकों को बार-बार अलग-अलग सरकारी स्तरों पर प्रक्रिया पूरी करने की जरूरत कम होगी और भूमि उपयोग परिवर्तन से जुड़े मामलों के निस्तारण में तेजी आने की संभावना है। हालांकि, भू-उपयोग परिवर्तन के लिए संबंधित क्षेत्र की महायोजना, विकास योजना और अन्य लागू नियमों का पालन करना जरूरी होगा।
सरकार ने केवल अधिकारों में बदलाव ही नहीं किया है, बल्कि भू-उपयोग परिवर्तन की फीस में भी बड़ी कटौती की है। कृषि भूमि को आवासीय उपयोग में बदलने पर लगने वाला शुल्क सर्किल रेट के 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया है। कृषि भूमि को औद्योगिक उपयोग में बदलने पर शुल्क 20 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत, जबकि कृषि से व्यावसायिक उपयोग में परिवर्तन का शुल्क डेढ़ गुना से घटाकर 75 प्रतिशत किया गया है। इसी तरह कृषि भूमि को कार्यालय उपयोग में बदलने पर शुल्क 100 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत किया गया है। वहीं आवासीय भूमि को व्यावसायिक उपयोग में बदलने पर भी शुल्क 100 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत करने का निर्णय लिया गया है।
योगी सरकार के मुताबिक, यह कदम ईज ऑफ डूइंग बिजनेस, डी-रेगुलेशन और भूमि संबंधी सेवाओं के डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण है। शुल्क कम होने और निर्णय लेने की प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर आसान होने से किसानों, भूमि मालिकों, कारोबारियों और निवेशकों को फायदा मिल सकता है। सरकार का मानना है कि इससे अनावश्यक प्रक्रियाओं में कमी आएगी और विकास से जुड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। हालांकि, कम शुल्क का मतलब यह नहीं है कि जमीन का उपयोग स्वतः बदला जा सकेगा; इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और संबंधित प्राधिकरण की मंजूरी जरूरी रहेगी।
इस फैसले को उत्तर प्रदेश में भूमि उपयोग व्यवस्था को अधिक सरल और निवेश के अनुकूल बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। खासतौर पर 6000 वर्गमीटर तक के मामलों में विकास प्राधिकरणों को अधिकार मिलने से निर्णय लेने की प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर तेज हो सकती है। आने वाले समय में इस बदलाव का असर आवासीय विकास, औद्योगिक गतिविधियों और व्यावसायिक परियोजनाओं पर देखने को मिल सकता है।





