भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। देश में विकसित स्वदेशी ड्रोन बोट से भारतीय नौसेना की समुद्री निगरानी और सुरक्षा क्षमताओं को मजबूती मिलने की उम्मीद है। पुणे की कंपनी सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने इस तकनीक को विकसित किया है। यह उपलब्धि ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब दुनिया भर में समुद्री सुरक्षा के लिए आधुनिक और बिना चालक दल वाले उपकरणों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।
इस ड्रोन बोट को अनमैन्ड सरफेस वेसल (USV) कहा जाता है। यह ऐसी नाव होती है, जिसे चलाने के लिए उसमें चालक दल की जरूरत नहीं होती। इसे दूर से नियंत्रित किया जा सकता है या स्वचालित तकनीक की मदद से तय निर्देशों के अनुसार चलाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल समुद्र में निगरानी रखने, संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाने और संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए किया जा सकता है।
रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय नौसेना ने ऐसी 12 सशस्त्र ड्रोन बोट का ऑर्डर दिया है। इन बोट में निगरानी और नेविगेशन से जुड़े उपकरणों के साथ 12.7 एमएम की रिमोट से संचालित होने वाली गन लगाने की व्यवस्था बताई गई है। इस तकनीक की मदद से जोखिम भरे समुद्री अभियानों में मानवीय खतरे को कम करते हुए निगरानी और जरूरत के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। यह परियोजना रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने वाली सरकार की iDEX पहल से भी जुड़ी है।
इन ड्रोन बोट की एक खासियत यह है कि इन्हें समुद्र में अलग-अलग मिशनों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। ये तटीय इलाकों की निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने और समुद्री सुरक्षा से जुड़े अभियानों में मदद कर सकती हैं। कई बोट को एक साथ संचालित करने की क्षमता से बड़े समुद्री क्षेत्र की निगरानी करना भी आसान हो सकता है।
भारत के लिए यह विकास इसलिए भी अहम है, क्योंकि हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। स्वदेशी ड्रोन बोट के निर्माण से आधुनिक रक्षा तकनीक के क्षेत्र में देश की क्षमता बढ़ेगी और विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। हालांकि, इनकी वास्तविक परिचालन क्षमता और प्रभाव का आकलन इनके परीक्षण तथा नौसेना में तैनाती के बाद ही किया जा सकेगा।




