भारत-तुर्किये रिश्तों में क्यों आई दूरी? UNGA 2026 में एर्दोगन ने फिर उठाया कश्मीर मुद्दा

भारत और तुर्किये के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और कूटनीतिक संपर्क बढ़ाने की कोशिश हुई, लेकिन कश्मीर और पाकिस्तान को लेकर तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन के रुख ने द्विपक्षीय संबंधों में गहरी खटास पैदा की। सितंबर 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में एर्दोगन ने एक बार फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया और कहा कि दक्षिण एशिया के विवादों, जिसमें कश्मीर भी शामिल है, को संयुक्त राष्ट्र चार्टर और संबंधित प्रस्तावों के तहत बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए।

भारत के लिए यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली लगातार कहती रही है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और भारत-पाकिस्तान के बीच लंबित मुद्दों को द्विपक्षीय बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। भारत तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को भी स्वीकार नहीं करता। एर्दोगन के UNGA बयान पर भी भारत के इसी रुख को दोहराए जाने की उम्मीद है।दोनों देशों के रिश्तों में बड़ा मोड़ 2019 के बाद आया, जब भारत ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटाए। एर्दोगन ने इस फैसले पर सार्वजनिक रूप से चिंता जताई और बाद के वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का उल्लेख किया। 2020 और 2021 में भी उन्होंने UNGA के मंच से कश्मीर का मुद्दा उठाया था। हालांकि 2024 में उन्होंने अपने UNGA भाषण में जम्मू-कश्मीर का उल्लेख नहीं किया था।

फरवरी 2025 में एर्दोगन की पाकिस्तान यात्रा के दौरान भी कश्मीर का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया। इसके बाद अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले और भारत की ओर से पाकिस्तान तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ढांचे के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-तुर्किये संबंध और तनावपूर्ण हुए। रिपोर्टों के अनुसार, तुर्किये ने उस समय पाकिस्तान के पक्ष में राजनीतिक समर्थन जताया और तनाव कम करने की अपील की।

रिश्तों में तनाव का दूसरा बड़ा कारण पाकिस्तान के साथ तुर्किये के बढ़ते रक्षा संबंध हैं। तुर्किये लंबे समय से पाकिस्तान के साथ सैन्य और रक्षा उद्योग के क्षेत्र में सहयोग करता रहा है। 2026 में तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक संयुक्त रक्षा समझौता भी हुआ, जिसे तीनों देशों की सुरक्षा सहयोग व्यवस्था के रूप में पेश किया गया। इससे भारत की रणनीतिक चिंताएं और बढ़ी हैं।इसके साथ ही भारत और तुर्किये के बीच आर्थिक संबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार और कूटनीतिक संपर्क जारी हैं और 2026 में विदेश कार्यालय स्तर की बातचीत भी दोबारा शुरू हुई। अप्रैल 2026 में दोनों देशों ने चार साल के अंतराल के बाद विदेश कार्यालय परामर्श का 12वां दौर आयोजित किया था। इससे संकेत मिलता है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद दोनों पक्ष संवाद के रास्ते को पूरी तरह बंद नहीं करना चाहते।कश्मीर के अलावा क्षेत्रीय भू-राजनीति भी भारत-तुर्किये संबंधों को प्रभावित करती है। भारत ने ग्रीस और आर्मेनिया जैसे तुर्किये के साथ मतभेद रखने वाले देशों के साथ अपने संबंध मजबूत किए हैं। वहीं तुर्किये पाकिस्तान के साथ अपने राजनीतिक और रक्षा सहयोग को लगातार बढ़ाता रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसी वजह से भारत-तुर्किये संबंधों में पाकिस्तान फैक्टर लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है।

2026 के UNGA भाषण में एर्दोगन का कश्मीर पर दोबारा बयान यह दिखाता है कि इस मुद्दे पर अंकारा और नई दिल्ली के रुख में अभी भी स्पष्ट अंतर है। हालांकि, इसे दोनों देशों के बीच सभी क्षेत्रों में संबंधों के टूटने के रूप में देखना सही नहीं होगा, क्योंकि व्यापार, राजनयिक संवाद और कुछ आर्थिक हित अब भी मौजूद हैं। फिलहाल सबसे बड़ा मतभेद कश्मीर, पाकिस्तान के साथ तुर्किये के रणनीतिक संबंध और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर को उठाने को लेकर बना हुआ है।