ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच कई महीनों से चल रहा विवाद अब एक नए समझौते की ओर बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से ग्रीनलैंड को अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बताते रहे हैं और इसे अमेरिकी नियंत्रण में लेने की बात भी कर चुके हैं। अब अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक समझौता हुआ है। हालांकि, यह समझौता ग्रीनलैंड को अमेरिका के हवाले करने का सौदा नहीं है।
इस समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने और वहां सुरक्षा से जुड़ी गतिविधियों को मजबूत करने का अधिकार मिलेगा। अमेरिका का कहना है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन जैसी शक्तियों से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व बहुत ज्यादा है। समझौते में यह भी व्यवस्था है कि अमेरिका की स्पष्ट मंजूरी के बिना किसी गैर-NATO देश को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा बनाने या संवेदनशील निवेश करने की अनुमति नहीं होगी।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने साफ किया है कि इस समझौते से ग्रीनलैंड की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता प्रभावित नहीं होगी। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने कहा है कि समझौता डेनमार्क के साम्राज्य की संप्रभुता और ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देता है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने भी इसे ग्रीनलैंड, डेनमार्क, अमेरिका और पश्चिमी गठबंधन की सुरक्षा मजबूत करने वाला कदम बताया है।
यह समझौता अमेरिका और डेनमार्क के बीच 1951 से चले आ रहे ग्रीनलैंड रक्षा समझौते की पृष्ठभूमि में हुआ है। 2004 में भी इस रक्षा व्यवस्था में बदलाव किए गए थे। नए समझौते के तहत अमेरिका की सैन्य मौजूदगी को और मजबूत करने की दिशा में काम किया जाएगा, जबकि ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन ही रहेगा।
अमेरिका और डेनमार्क के बीच इस समझौते पर अगले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान औपचारिक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। इसके बाद इसे लागू करने के लिए जरूरी राष्ट्रीय संसदीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इस तरह ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की पुरानी अधिग्रहण की मांग और डेनमार्क-ग्रीनलैंड की संप्रभुता की चिंता के बीच फिलहाल सुरक्षा सहयोग पर आधारित एक नई व्यवस्था सामने आई है।





