Volkswagen में 1 लाख नौकरियों पर संकट, भारत पर कितना पड़ेगा असर? जानिए क्या बदलेगा

जर्मनी की दिग्गज ऑटोमोबाइल कंपनी Volkswagen ने अपनी अब तक की सबसे बड़ी पुनर्गठन योजना को मंजूरी दे दी है। कंपनी 2030 तक करीब 1 लाख नौकरियों में कटौती करने जा रही है। इसमें पहले से घोषित 50 हजार पदों के अलावा लगभग 50 हजार और पद कम किए जाएंगे। Volkswagen का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब कंपनी को चीन की कम कीमत वाली इलेक्ट्रिक कार कंपनियों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा, यूरोप में कमजोर मांग और अमेरिका की टैरिफ नीतियों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

Volkswagen के बोर्ड ने 50 हजार अतिरिक्त पदों में कटौती को मंजूरी दे दी है। कंपनी यूरोप में अपनी उत्पादन क्षमता को भी घटाने की तैयारी कर रही है। जर्मनी के Emden, Zwickau, Hanover और Audi के Neckarsulm प्लांट्स में मौजूदा उत्पादन को लेकर बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। कंपनी का कहना है कि यूरोप में उसके पास करीब 5 लाख वाहनों की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है और मौजूदा मांग के हिसाब से उत्पादन नेटवर्क को अधिक कुशल बनाना जरूरी है।

Volkswagen के मुताबिक, उसका लक्ष्य सिर्फ कर्मचारियों की संख्या कम करना नहीं, बल्कि कंपनी की लागत घटाकर उसे बदलते ऑटोमोबाइल बाजार के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। कंपनी अपने मॉडल पोर्टफोलियो को करीब 50 फीसदी तक कम करने और प्रत्येक मॉडल की उत्पादन मात्रा बढ़ाने की योजना भी बना रही है। इससे प्रति वाहन उत्पादन लागत घटाने और मुनाफे में सुधार की कोशिश की जाएगी।

अब सवाल यह है कि जर्मनी में होने वाली इतनी बड़ी छंटनी का भारत पर क्या असर पड़ेगा? सीधे तौर पर देखें तो भारत में Volkswagen के 1 लाख कर्मचारियों की नौकरी जाने का खतरा नहीं है। घोषित कटौती मुख्य रूप से Volkswagen के वैश्विक पुनर्गठन का हिस्सा है और जर्मनी के उत्पादन नेटवर्क पर इसका बड़ा असर पड़ रहा है। भारत में कंपनी का संचालन अलग परिस्थितियों में किया जा रहा है।

भारत में Volkswagen Group की Skoda Auto Volkswagen India के जरिए Pune और Chhatrapati Sambhajinagar में मैन्युफैक्चरिंग सुविधाएं हैं। इन प्लांट्स की संयुक्त वार्षिक उत्पादन क्षमता करीब 3.2 लाख वाहनों की है। यहां Volkswagen और Skoda के अलावा Audi के कुछ मॉडल भी बनाए जाते हैं और भारत से वाहनों का निर्यात भी किया जाता है।दिलचस्प बात यह है कि भारत में भी Volkswagen Group ने पहले ही कर्मचारियों के लिए Voluntary Retirement Scheme यानी VRS शुरू की थी। हालांकि कंपनी ने स्पष्ट किया था कि यह योजना यूनियन के अनुरोध पर शुरू की गई है और पूरी तरह स्वैच्छिक है। रिपोर्टों के मुताबिक, भारत में इस योजना से बड़ी संख्या में कर्मचारियों के बाहर जाने की उम्मीद नहीं थी।

भारत Volkswagen के लिए केवल एक बिक्री बाजार नहीं, बल्कि उत्पादन और निर्यात का महत्वपूर्ण केंद्र भी बनता जा रहा है। कंपनी के Pune और Chhatrapati Sambhajinagar प्लांट्स से बने वाहन भारत के अलावा दूसरे बाजारों में भी भेजे जाते हैं। ऐसे में जर्मनी में उत्पादन क्षमता घटाने का एक संभावित फायदा यह हो सकता है कि Volkswagen Group लागत और उत्पादन को उन बाजारों की ओर ज्यादा केंद्रित करे जहां भविष्य में विकास की संभावना अधिक है।

भारत में इसका दूसरा बड़ा असर ऑटो पार्ट्स और सप्लायर नेटवर्क पर पड़ सकता है। Volkswagen Group ने भारत में स्थानीयकरण और स्थानीय सप्लायर नेटवर्क को बढ़ाया है। यदि कंपनी वैश्विक स्तर पर लागत कम करने के लिए सप्लाई चेन को दोबारा व्यवस्थित करती है, तो भारतीय ऑटो-कंपोनेंट कंपनियों को नए निर्यात ऑर्डर और वैश्विक सप्लाई चेन में अधिक भूमिका मिलने का अवसर मिल सकता है। हालांकि यह अभी संभावित प्रभाव है, कंपनी की ओर से भारत को लेकर ऐसा कोई नया फैसला घोषित नहीं किया गया है।

वहीं दूसरी तरफ, अगर Volkswagen की वैश्विक बिक्री और निवेश योजनाओं पर दबाव लंबे समय तक बना रहता है तो भारत में नए मॉडल, उत्पादन क्षमता या बड़े निवेश के फैसले भी ज्यादा सावधानी से लिए जा सकते हैं। इसलिए भारत के लिए यह खबर पूरी तरह नकारात्मक या सकारात्मक नहीं है। इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनी वैश्विक पुनर्गठन के बाद उत्पादन और निवेश को किन देशों में प्राथमिकता देती है।

Volkswagen ने भारत को लेकर पहले भी लंबी अवधि की प्रतिबद्धता जताई है और देश को अपने विकास के महत्वपूर्ण बाजारों में शामिल किया है। कंपनी की भारतीय इकाई ने हाल के वर्षों में स्थानीय स्तर पर उत्पादन और नए मॉडल्स पर जोर दिया है। इसलिए फिलहाल 1 लाख नौकरियों की वैश्विक कटौती को भारत में बड़े पैमाने पर तत्काल छंटनी के संकेत के रूप में देखना सही नहीं होगा। बल्कि आने वाले समय में भारत Volkswagen के लिए लागत-कुशल उत्पादन, स्थानीयकरण और निर्यात के लिहाज से और महत्वपूर्ण बन सकता है।

कुल मिलाकर, Volkswagen का यह फैसला वैश्विक ऑटो इंडस्ट्री में हो रहे बड़े बदलाव का संकेत है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा, चीनी कंपनियों का दबाव, कमजोर यूरोपीय मांग और बढ़ती उत्पादन लागत ने पारंपरिक यूरोपीय कार कंपनियों को अपने कारोबार का ढांचा बदलने पर मजबूर किया है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह इस बदलाव में केवल बड़ा बाजार न बने, बल्कि Volkswagen जैसी वैश्विक कंपनियों के लिए उत्पादन, रिसर्च, कंपोनेंट सप्लाई और निर्यात का और मजबूत केंद्र भी बन सके।