JNU में 17 दिन से भूख हड़ताल पर छात्र, CPM सांसद ने राष्ट्रपति और शिक्षा मंत्री से मांगा हस्तक्षेप

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में छात्रों की भूख हड़ताल लगातार जारी है। 17 दिनों से आंदोलन कर रहे छात्रों के समर्थन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPM के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और केंद्रीय शिक्षा मंत्री से मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। उन्होंने छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार करने और विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है।

छात्रों का यह आंदोलन छात्र संघ के निर्वाचित प्रतिनिधियों के निष्कासन और मुख्य प्रॉक्टर कार्यालय (CPO) के नियमों को लेकर शुरू हुआ है। प्रदर्शनकारी छात्र निष्कासन के आदेश वापस लेने और विवादित नियमों में बदलाव की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी शिकायतों पर उचित कार्रवाई नहीं कर रहा है। इसी के विरोध में छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं।

CPM सांसद जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति और शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर छात्रों की स्थिति पर चिंता जताई है। उन्होंने राष्ट्रपति से विश्वविद्यालय की विजिटर के रूप में अपनी भूमिका निभाते हुए इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है। उनकी मांग है कि छात्र प्रतिनिधियों के निष्कासन आदेश वापस लिए जाएं, विवादित नियमों की समीक्षा की जाए और छात्रों की लंबित समस्याओं का समाधान किया जाए। उन्होंने छात्रों की बात सुनने और उनकी शिकायतों पर उचित कार्रवाई करने की जरूरत पर भी जोर दिया है।

छात्रों की मांगें केवल निष्कासन और अनुशासनात्मक नियमों तक सीमित नहीं हैं। वे लैंगिक उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों के निपटारे के लिए GSCASH व्यवस्था को बहाल करने, जेएनयू प्रवेश परीक्षा (JNUEE) फिर से शुरू करने और विश्वविद्यालय की अन्य समस्याओं का समाधान करने की मांग भी कर रहे हैं। छात्रों का कहना है कि उनकी मांगों पर ठोस निर्णय लिया जाना चाहिए। वहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र संघ के बीच इस मुद्दे पर विवाद बना हुआ है।

लगातार जारी भूख हड़ताल के बीच छात्रों की सेहत को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। छात्र संघ ने प्रशासन की कार्रवाई और चिकित्सा सुविधाओं को लेकर सवाल उठाए हैं। ऐसे में राष्ट्रपति और शिक्षा मंत्री से हस्तक्षेप की मांग ने इस मामले को और महत्वपूर्ण बना दिया है। अब देखना होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन और केंद्र सरकार इस विवाद को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाते हैं और छात्रों की मांगों पर कब तक कोई निर्णय लिया जाता है।