केंद्र सरकार ने IDBI बैंक के निजीकरण की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए इसकी 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की कंपनी Fairfax Financial Holdings को बेचने की मंजूरी दे दी है। इस सौदे की कुल कीमत 52,878.08 करोड़ रुपये तय की गई है। 14 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी। यह भारत के वित्तीय क्षेत्र में अब तक के सबसे बड़े विदेशी निवेश सौदों में से एक है।
इस सौदे में केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगी, जबकि भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगा। दोनों की कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी Fairfax को मिलेगी। सौदा पूरा होने के बाद सरकार के पास IDBI बैंक की 15 प्रतिशत और LIC के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी बची रहेगी। इस तरह दोनों की कुल हिस्सेदारी 34 प्रतिशत रह जाएगी और बैंक का प्रबंधन नियंत्रण नए निवेशक के हाथों में चला जाएगा।
इस सौदे के तहत Fairfax प्रति शेयर 81 रुपये का भुगतान करेगी। सरकार के अनुसार, स्वतंत्र एजेंसियों ने बैंक के एक शेयर का औसत उचित मूल्य 75.99 रुपये आंका था। ऐसे में 81 रुपये की बोली इस निर्धारित मूल्य से अधिक है। सरकार का कहना है कि इस सौदे से बैंक को नई पूंजी, आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन का लाभ मिल सकता है। इससे बैंक की सेवाओं में सुधार और कारोबार के विस्तार में मदद मिलने की उम्मीद है।
IDBI बैंक की वित्तीय स्थिति पहले काफी कमजोर हो गई थी। वर्ष 2017 में भारतीय रिजर्व बैंक ने खराब कर्ज और नुकसान के कारण बैंक को प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (PCA) के तहत रखा था। इसके बाद LIC ने बैंक में पूंजी लगाई और उसकी वित्तीय स्थिति सुधारने में अहम भूमिका निभाई। समय के साथ बैंक की स्थिति में सुधार हुआ और अब सरकार ने इसके निजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। इस बिक्री की प्रक्रिया की घोषणा पहली बार वर्ष 2022 में की गई थी, लेकिन कई कारणों से इसमें देरी हुई।
हालांकि, इस सौदे को पूरा करने के लिए अभी भारतीय रिजर्व बैंक की जरूरी मंजूरी और अन्य नियामकीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। Fairfax को भी निर्धारित नियमों के तहत अपनी पात्रता साबित करनी होगी। सरकार को उम्मीद है कि निजी निवेश और नए प्रबंधन से IDBI बैंक को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। वहीं, इस फैसले पर बैंक कर्मचारियों और यूनियनों की ओर से विरोध भी सामने आया है। उनका कहना है कि बैंक के बेहतर प्रदर्शन के बावजूद इसकी बड़ी हिस्सेदारी विदेशी कंपनी को बेचना चिंता का विषय है।





