आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से चातुर्मास का शुभारंभ होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार माह बाद देवउठनी एकादशी पर जागते हैं। इस अवधि को पूजा-पाठ, जप, तप और आत्मचिंतन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
चातुर्मास के दौरान श्रद्धालुओं को नियमित रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। प्रतिदिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करना, श्रीहरि को तुलसी दल अर्पित करना तथा जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करना विशेष फलदायी माना जाता है। इसके अलावा सात्विक भोजन, संयमित जीवन और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन भी इस अवधि में करने की सलाह दी जाती है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, चातुर्मास के समय विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते। इस दौरान व्रत, भजन-कीर्तन, सत्संग और सेवा कार्यों का विशेष महत्व बताया गया है।
मान्यता है कि जो व्यक्ति चातुर्मास के चार महीनों में श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान विष्णु की आराधना करता है, उसे सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है




