जयशंकर के सामने अज़रबैजान ने माना भारत से रहे हैं मतभेद, जानिए क्यों अहम है यह दौरा

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के अज़रबैजान दौरे ने दोनों देशों के संबंधों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। अज़रबैजान की राजधानी बाकू में जयशंकर ने अपने समकक्ष जेहुन बायरामोव और राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव से मुलाकात की। इस दौरान व्यापार, ऊर्जा, सुरक्षा और आपसी सहयोग बढ़ाने जैसे अहम मुद्दों पर बातचीत हुई। हालांकि, इस दौरे की सबसे ज्यादा चर्चा अज़रबैजान के विदेश मंत्री के उस बयान को लेकर हो रही है, जिसमें उन्होंने भारत और अज़रबैजान के बीच रहे मतभेदों को खुलकर स्वीकार किया।

जेहुन बायरामोव ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद रहे हैं। इन मतभेदों का असर द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों ने बातचीत के जरिए इन मुद्दों को समझने और संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब भारत और अज़रबैजान के बीच रिश्तों को बेहतर बनाने की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है।

भारत और अज़रबैजान के बीच तनाव की एक प्रमुख वजह मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद सामने आई थी। पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की थी। उस समय अज़रबैजान ने पाकिस्तान का समर्थन किया था और भारत की सैन्य कार्रवाई की आलोचना की थी। इससे दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ा। इसके अलावा, अज़रबैजान के तुर्किये के साथ करीबी संबंध और भारत की आर्मेनिया के साथ रक्षा साझेदारी भी दोनों देशों के बीच कूटनीतिक मतभेदों का हिस्सा रही है।

जयशंकर के इस दौरे में आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर भी विशेष जोर दिया गया। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा, कृषि, दवाइयों और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हुई। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे यानी INSTC के माध्यम से संपर्क बढ़ाने और व्यापारिक गतिविधियों को गति देने पर भी ध्यान दिया गया। इस गलियारे से भारत को ईरान, कैस्पियन क्षेत्र और रूस के साथ व्यापारिक संपर्क मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

इस दौरे को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दोनों देशों के बीच मतभेदों के बावजूद बातचीत और सहयोग का रास्ता खुला रखने की कोशिश की जा रही है। भारत के लिए अज़रबैजान रणनीतिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जबकि अज़रबैजान के लिए भारत एक बड़ा बाजार और संभावित आर्थिक साझेदार है। ऐसे में दोनों देश अपने मतभेदों को अलग रखते हुए साझा हितों पर काम करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

कुल मिलाकर, जयशंकर का अज़रबैजान दौरा केवल एक कूटनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बातचीत के बाद दोनों देश अपने मतभेदों को कितना कम कर पाते हैं और व्यापार, सुरक्षा तथा रणनीतिक सहयोग के क्षेत्रों में कितनी प्रगति होती है।