उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य में तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया है। इसके बाद योगी सरकार की ओर से पहला बयान सामने आया है। पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि सरकार अदालत के फैसले का सम्मान करती है, लेकिन पहले आदेश का विस्तार से अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद ही आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा।
मंत्री ओम प्रकाश राजभर के मुताबिक, सरकार अदालत के आदेश और संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखकर आगे का कदम उठाएगी। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि पंचायत चुनाव अगले तीन महीने में ही करा दिए जाएंगे या सरकार इस मामले में कोई दूसरा कानूनी रास्ता अपनाएगी। रिपोर्टों के अनुसार, सरकार के सुप्रीम कोर्ट जाने की संभावना पर भी चर्चा हो रही है, लेकिन इस बारे में अंतिम फैसला स्पष्ट नहीं है।
दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर को राज्य निर्वाचन आयोग और सरकार को तीन महीने के भीतर उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया। इसमें ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के चुनाव शामिल हैं। अदालत ने कहा कि चुनाव मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के तहत कराए जाएं। इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण भी शामिल है।
पंचायत चुनाव में देरी की एक बड़ी वजह ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट का लंबित होना है। सरकार ने इस आयोग का गठन पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण से जुड़े आंकड़े और सिफारिशें तैयार करने के लिए किया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आयोग की रिपोर्ट लंबित होने के आधार पर चुनाव को टाला नहीं जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि जब तक चुनाव पूरे नहीं होते, तब तक निवर्तमान ग्राम प्रधान प्रशासक के रूप में काम करते रहेंगे।
इस मामले में अब सरकार के अगले कदम पर सबकी नजर है। एक ओर अदालत ने तीन महीने के भीतर चुनाव कराने की समय-सीमा तय की है, वहीं दूसरी ओर ओबीसी आयोग की रिपोर्ट, सीटों के आरक्षण और चुनावी तैयारियों से जुड़ी चुनौतियां भी हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार के फैसले से यह स्पष्ट होगा कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव तय समय के भीतर किस तरह कराए जाएंगे। फिलहाल तीन महीने में चुनाव होने का आदेश अदालत की ओर से दिया गया है, जबकि सरकार ने अपनी आगे की रणनीति पर अंतिम फैसला घोषित नहीं किया है।





