भारत में सेक्युलरिज्म की अवधारणा पश्चिम से अलग: मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने 18 सितंबर को मध्य प्रदेश के उज्जैन में आयोजित ‘युवा धर्म संसद’ में भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को लेकर महत्वपूर्ण बातें कहीं। करीब 1,700 युवा प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में ‘धर्म’ की अवधारणा पश्चिमी देशों के ‘रिलिजन’ से अलग है।

भागवत के मुताबिक, पश्चिमी देशों में आधुनिक सेक्युलरिज्म का विकास शासकों और धार्मिक संस्थाओं के बीच सत्ता को लेकर हुए संघर्षों के बाद हुआ। उनके अनुसार वहां राज्य और धार्मिक सत्ता के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा हुआ, जबकि भारत की परंपरा में भौतिक और आध्यात्मिक जीवन को अलग-अलग देखने के बजाय दोनों को साथ लेकर चलने की सोच रही है। इसी वजह से उन्होंने कहा कि पश्चिमी अर्थ में सेक्युलरिज्म को भारतीय संदर्भ में उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता।

भागवत ने भारत के संदर्भ में ‘पंथ-निरपेक्षता’ को अलग तरीके से समझाया। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा में अलग-अलग मत और पंथ मानने वाले लोगों के साथ भेदभाव नहीं किया गया और सभी को अपने तरीके से आस्था रखने की स्वतंत्रता दी गई। उनके अनुसार, भारत की सोच सभी के साथ समान व्यवहार और दूसरे की आस्था का सम्मान करने पर आधारित रही है।

उन्होंने युवाओं से धर्म को केवल पूजा-पद्धति या बुजुर्गों से जुड़ी चीज मानने के बजाय उसके व्यापक अर्थ को समझने की अपील भी की। भागवत ने कहा कि धर्म व्यक्ति के आचरण, कर्तव्यों और समाज के प्रति जिम्मेदारी से जुड़ा है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अलग-अलग रास्ते और मान्यताएं होने के बावजूद समाज में एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सह-अस्तित्व की भावना बनी रहनी चाहिए।