हरियाणा के गुरुग्राम स्थित पटौदी में जमीन से जुड़ी धोखाधड़ी का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि जिस व्यक्ति की मौत वर्ष 1970 में हो चुकी थी, उसे करीब 55 साल बाद सरकारी और राजस्व दस्तावेजों में जिंदा दिखाकर उसकी पुश्तैनी जमीन को बेचने की कोशिश की गई। मामले में अदालत के निर्देश के बाद पटौदी पुलिस ने FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
मामला करीब 4 कनाल 14 मरला जमीन से जुड़ा है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, उनके पूर्वज चमनलाल की मृत्यु 15 दिसंबर 1970 को हो गई थी। उनके पास मृत्यु प्रमाण पत्र और पुराने राजस्व रिकॉर्ड भी मौजूद होने का दावा किया गया है। इसके बावजूद आरोप है कि जनवरी 2025 में चमनलाल के नाम से मिलता-जुलता एक व्यक्ति तैयार किया गया और उसके नाम पर दिल्ली के नरेला का पता दिखाकर कथित तौर पर फर्जी आधार और पैन कार्ड तैयार कराए गए।
शिकायत के मुताबिक, 22 जनवरी 2025 को एक व्यक्ति को चमनलाल के रूप में पेश करके उक्त जमीन की रजिस्टर्ड बिक्री कराई गई और जमीन परवीन नाम की महिला के नाम ट्रांसफर कर दी गई। इसके करीब एक महीने बाद 25 फरवरी को परवीन ने कथित तौर पर यही संपत्ति अपने पति नूर हसन के नाम ट्रांसफर डीड के जरिए स्थानांतरित कर दी। दोनों दस्तावेजों में गांव के नंबरदार मामन सिंह के गवाह के तौर पर हस्ताक्षर होने का भी आरोप लगाया गया है।
मामला सामने आने के बाद शिकायतकर्ताओं ने पुलिस से कार्रवाई की मांग की। पुलिस की ओर से शुरुआती स्तर पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए मामला अदालत तक पहुंचा। ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास की अदालत ने आरोपों की गंभीरता को देखते हुए पटौदी थाना पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि मामले की तह तक जाने के लिए पुलिस जांच जरूरी है।
अब पुलिस कथित फर्जी पहचान तैयार करने वाले व्यक्ति, फर्जी आधार और पैन कार्ड बनवाने वालों तथा जमीन की रजिस्ट्री प्रक्रिया में शामिल लोगों की भूमिका की जांच कर रही है। राजस्व रिकॉर्ड और रजिस्ट्री से जुड़े दस्तावेज भी जांच के दायरे में हैं। पुलिस के मुताबिक, FIR दर्ज कर आरोपों का सत्यापन किया जा रहा है और जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।
यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि एक ऐसे व्यक्ति की पहचान का कथित इस्तेमाल किया गया, जिसकी मृत्यु को पांच दशक से अधिक समय बीत चुका था। फिलहाल किसी आरोपी की भूमिका अदालत में साबित नहीं हुई है और पुलिस जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कथित फर्जीवाड़े में कौन-कौन लोग शामिल थे और जमीन के रिकॉर्ड में हेरफेर कैसे किया गया।





