चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत पहुंचे हैं। वह 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। यह दौरा इसलिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत और चीन के रिश्तों में लंबे समय तक तनाव रहा। उस संघर्ष में 20 भारतीय और 4 चीनी सैनिकों की मौत हुई थी। इसके बाद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के साथ-साथ व्यापार, निवेश और कूटनीतिक संबंधों पर भी असर पड़ा। ऐसे में जिनपिंग की भारत यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इस दौरे के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की अहम द्विपक्षीय मुलाकात भी हो रही है। बातचीत में सीमा पर शांति और स्थिरता के साथ-साथ व्यापार, निवेश, बाजार पहुंच, वीजा और दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों जैसे मुद्दे प्रमुख रह सकते हैं। 2024 में सीमा पर सैनिकों के पीछे हटने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिले हैं और अब सीधी उड़ानों तथा कारोबारी संपर्क को भी बढ़ाने की कोशिश हो रही है। हालांकि, सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक अविश्वास जैसे बड़े मुद्दे अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
वहीं, BRICS के लिहाज से भी जिनपिंग का भारत दौरा काफी महत्वपूर्ण है। इस सम्मेलन में भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका समेत कई सदस्य और साझेदार देश वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा और बदलते भू-राजनीतिक हालात पर चर्चा कर रहे हैं। भारत BRICS के जरिए ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने के साथ-साथ अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को आगे बढ़ाना चाहता है। ऐसे में जिनपिंग की यात्रा सिर्फ भारत-चीन रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे BRICS समूह और एशिया की रणनीतिक राजनीति पर पड़ सकता है। अगर मोदी-जिनपिंग बातचीत से विश्वास बहाली आगे बढ़ती है, तो दोनों देशों के रिश्तों में एक नई शुरुआत की संभावना बन सकती है—हालांकि भारत सीमा और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर सतर्क रुख बनाए रखेगा।





