
नेपाल में प्राकृतिक आपदा का प्रकोप थमने का नाम नहीं ले रहा है, जहाँ हाल ही में हुई अत्यधिक मूसलाधार बारिश के बाद आई विनाशकारी बाढ़ और भयानक भूस्खलन ने पूरे देश में चारों तरफ भीषण तबाही मचा दी है। नेपाल सरकार द्वारा जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस भीषण जल प्रलय और पहाड़ों के खिसकने के कारण मरने वालों की संख्या 1,355 के आंकड़े तक पहुँच गई है, जिससे पूरा देश गहरे संकट में डूब गया है। पहाड़ी और तराई क्षेत्रों में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के कारण देश की प्रमुख नदियां और बरसाती नाले उफान पर हैं, जिससे निचले इलाकों में पानी भर गया है तथा सैकड़ों घर पूरी तरह जलमग्न हो गए हैं या मलबे के नीचे दब चुके हैं।इस भयावह आपदा के चलते देश का परिवहन और संपर्क तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो गया है; मुख्य राजमार्गों, पुलों और ग्रामीण सड़कों के बह जाने तथा जगह-जगह भूस्खलन के कारण कई जिलों का देश के बाकी हिस्सों से संपर्क पूरी तरह कट चुका है। सड़कों के बंद होने से उन क्षेत्रों में फँसे लोगों तक पहुँचना एक बेहद मुश्किल और चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया है। हजारों परिवार बेघर हो चुके हैं और सुरक्षित स्थानों की तलाश में सरकारी राहत शिविरों या अस्थाई तंबुओं में शरण लेने के लिए मजबूर हैं, जहाँ भोजन, पीने के साफ पानी और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी किल्लत बनी हुई है।आपदा की इस कठिन घड़ी में नेपाली सेना, सशस्त्र पुलिस बल और स्थानीय प्रशासन की संयुक्त टीमें युद्ध स्तर पर राहत और बचाव कार्य में जुटी हुई हैं। जेसीबी और भारी मशीनों की सहायता से सड़कों पर फैले मलबे को हटाने और दबे हुए लोगों की तलाश का काम लगातार किया जा रहा है, हालांकि रुक-रुक कर हो रही बारिश और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बचाव दलों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। पर्यावरण और मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में इस तरह की अचानक आने वाली भयंकर बाढ़ और चरम मौसमी घटनाओं का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ पहाड़ियों पर बिना किसी पूर्व योजना के किया जा रहा अवसंरचनात्मक निर्माण है। फिलहाल नेपाल सरकार के सामने सबसे बड़ी प्राथमिकता प्रभावित लोगों की जान बचाना, महामारी को फैलने से रोकना और आपदा से तबाह हुए बुनियादी ढांचे का पुनर्गठन करना है।





