
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर एक सदियों पुरानी मस्जिद को ढहाए जाने की प्रशासनिक कार्रवाई के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक जुबानी जंग तेज हो गई है। यह मामला कानूनी प्रक्रियाओं, स्थानीय प्रशासन की कार्रवाई, और पाकिस्तान द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर की गई तीखी टिप्पणी के बाद एक बड़ा भू-राजनीतिक मुद्दा बन गया है।
उत्तर प्रदेश प्रशासन और स्थानीय पुलिस की भारी मौजूदगी के बीच तड़के यह निष्कासन कार्रवाई पूरी की गई। सहारनपुर जिला प्रशासन के अनुसार, यह ढांचा जिला मजिस्ट्रेट (DM) कार्यालय की सरकारी भूमि पर अनधिकृत रूप से बना हुआ था। इस मामले में विधिक कार्यवाही कई महीनों से जारी थी, जिसके तहत सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटाने का स्पष्ट आदेश दिया था। हालाँकि, मस्जिद प्रबंधन समिति ने इस निर्णय के खिलाफ जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील दाखिल की थी, परंतु समीक्षा के बाद अदालत ने अपील को खारिज कर दिया और निष्कासन के आदेश को बरकरार रखा। कानूनी रास्ते बंद होने के बाद प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करते हुए बुलडोजर कार्रवाई के माध्यम से अतिक्रमण को हटा दिया।
सहारनपुर में हुई इस घटना पर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय (Foreign Office) ने तुरंत एक आधिकारिक बयान जारी कर इसकी कड़े शब्दों में निंदा की। पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार के कार्यालय से जुड़े इस बयान में आरोप लगाया गया कि भारत में अल्पसंख्यकों के धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों को योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों से हस्तक्षेप करने तथा भारत में इस्लामिक विरासत और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया।पाकिस्तान का यह बयान दोनों पड़ोसी देशों के बीच चल रही हालिया कूटनीतिक तनातनी का एक नया अध्याय माना जा रहा है। गौरतलब है कि यह विवाद उस समय उपजा है जब कुछ ही समय पहले भारत ने पाकिस्तान के नारोवाल जिले में स्थित एक प्राचीन ऐतिहासिक हिंदू मंदिर को पहुंचाए गए नुकसान पर इस्लामाबाद के समक्ष कड़ा विरोध दर्ज कराया था। भारत ने मांग की थी कि पाकिस्तान अपने देश में सिख, हिंदू और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण करे। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान ने सहारनपुर की घटना का इस्तेमाल भारत के उस कूटनीतिक दबाव को संतुलित करने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जवाबी आक्रामक रुख अपनाने के लिए किया है।भारतीय विदेश नीति के स्थापित रुख के अनुसार, भारत सरकार हमेशा से ऐसे मामलों में पाकिस्तान की टिप्पणियों को बेबुनियाद और अपने आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप मानकर खारिज करती रही है। भारतीय अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि सहारनपुर में हुई कार्रवाई पूरी तरह से कानून के शासन, साक्ष्यों और निष्पक्ष न्यायिक आदेशों के आधार पर की गई एक प्रशासनिक प्रक्रिया है। इसके साथ ही, भारतीय पक्ष ने बार-बार यह दोहराया है कि जो देश स्वयं अपने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने में विफल रहा है, उसे भारत के स्वतंत्र न्यायिक और प्रशासनिक निर्णयों पर टिप्पणी करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।





