हिंद महासागर में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, जहां मालदीव ने भारत के साथ हुए अपने पिछले समझौतों को दरकिनार करते हुए थिलाफूशी पोर्ट प्रोजेक्ट के पहले चरण का काम चीन को सौंप दिया है। ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मालदीव पोर्ट्स लिमिटेड ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना के निर्माण के लिए चीनी सरकारी फर्म ‘चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी’ (CHEC) के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। थिलाफूशी मालदीव का एक मुख्य औद्योगिक द्वीप है, और राजधानी माले के बंदरगाह पर मालवाहक जहाजों के भारी दबाव और भीड़भाड़ को कम करने के उद्देश्य से यहां एक आधुनिक वाणिज्यिक बंदरगाह बनाने की योजना लंबे समय से चल रही थी। वर्ष 2024 में राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की भारत यात्रा के दौरान इस बात पर सहमति बनी थी कि भारत और मालदीव मिलकर थिलाफूशी में नए पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करेंगे, लेकिन अब मालदीव प्रशासन ने बिना किसी खुली बोली प्रक्रिया के सीधे तौर पर यह ठेका चीनी कंपनी को देकर अपने फैसले से यू-टर्न ले लिया है।

मालदीव का यह रणनीतिक कदम भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंद महासागर में उसकी समुद्री उपस्थिति के दृष्टिकोण से एक बड़ा झटका माना जा रहा है। भारत के ठीक पास स्थित इस द्वीप पर एक विवादास्पद चीनी कंपनी की सीधी एंट्री से नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ गई हैं, क्योंकि चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी और उसकी मूल संस्था CCCC पर दुनिया के कई देशों में श्रीलंका के हम्बनटोटा पोर्ट की तर्ज पर ‘कर्ज जाल’ (Debt Trap) बिछाने और रणनीतिक संपत्तियों को प्रभावित करने के आरोप लगते रहे हैं। यह घटनाक्रम ऐसे नाजुक समय में सामने आया है जब मालदीव बेहद गंभीर राजकोषीय संकट और आर्थिक सुस्ती का सामना कर रहा है। हालांकि भारत ने मालदीव में ग्रेट माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट समेत कई अरब डॉलर के बुनियादी ढांचे के निर्माण में सहयोग दिया है, लेकिन मालदीव का चीन की तरफ बढ़ता यह झुकाव दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में एक नई कूटनीतिक चुनौती खड़ी करता है।





