सरकारी स्कूलों में पर्ची का खेल, कहां गए 503 करोड़? राजस्थान में बच्चों की जान खतरे में, मरम्मत के नाम पर फर्जीवाड़ा

राजस्थान के सरकारी स्कूलों की मरम्मत के लिए जारी किए गए 503 करोड़ रुपये के बजट को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सामने आई जांच रिपोर्टों में दावा किया गया है कि राज्य के 20 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों में मरम्मत कार्य के नाम पर बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं। आरोप है कि कई जगहों पर बिना वास्तविक सर्वे के ही काम स्वीकृत कर दिया गया, जबकि कुछ स्थानों पर केवल कागजी कार्रवाई पूरी कर भुगतान जारी कर दिया गया।

रिपोर्ट के अनुसार कई स्कूलों में टेंडर और कार्य आवंटन की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के बजाय कथित तौर पर “पर्चियों” के माध्यम से की गई। इतना ही नहीं, कई भवनों को सुरक्षित दिखाने के लिए अधिकारियों द्वारा बिना मौके का निरीक्षण किए ही अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी करने के आरोप भी लगे हैं। इससे पूरे मरम्मत अभियान की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

जांच में यह भी सामने आया कि अनेक स्कूल भवन आज भी जर्जर स्थिति में हैं। कहीं छतों में बड़ी-बड़ी दरारें हैं, तो कहीं प्लास्टर गिर रहा है। कई स्थानों पर केवल दीवारों पर रंग-रोगन कर मरम्मत पूरी होने का दावा किया गया, जबकि भवन की मूल संरचना पहले जैसी ही कमजोर बनी रही। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे भवनों में पढ़ाई कर रहे बच्चों और शिक्षकों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

बताया जा रहा है कि मरम्मत कार्यों के लिए जारी राशि का उपयोग किस प्रकार किया गया, इसकी जांच की मांग तेज हो गई है। विपक्ष ने मामले में उच्च स्तरीय जांच और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। वहीं शिक्षा विभाग का कहना है कि यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी स्कूलों की मरम्मत केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। भवनों की गुणवत्ता की स्वतंत्र तकनीकी जांच, पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया और समय-समय पर भौतिक सत्यापन अनिवार्य होना चाहिए, ताकि सरकारी धन का सही उपयोग हो और बच्चों को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा मिल सके।

फिलहाल इस पूरे मामले ने राजस्थान में सरकारी स्कूलों की आधारभूत सुविधाओं और सरकारी धन के उपयोग को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं बल्कि लाखों स्कूली बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा एक बड़ा प्रश्न भी है।