दिल्ली का जंतर-मंतर आज देश में विरोध प्रदर्शनों और जन आंदोलनों का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां किसान, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाते हैं। लेकिन इसकी शुरुआत लोकतांत्रिक आंदोलनों से नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान के अध्ययन से हुई थी।
जंतर-मंतर का निर्माण 1724 के आसपास जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने करवाया था। उस समय भारत में मुगल शासन था। महाराजा को खगोल विज्ञान में गहरी रुचि थी। उन्होंने सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए यहां विशाल वैज्ञानिक यंत्र बनवाए थे। दिल्ली के अलावा जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में भी ऐसी वेधशालाएं बनाई गईं।
समय के साथ जंतर-मंतर की पहचान बदलती गई और यह सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर विरोध दर्ज कराने का महत्वपूर्ण स्थान बन गया। यहां महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, किसानों की समस्याओं और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर प्रदर्शन किए जाते रहे हैं। साल 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने इसे देशभर में खास पहचान दिलाई। इस आंदोलन में जन लोकपाल कानून बनाने की मांग उठाई गई थी।
आज जंतर-मंतर केवल एक ऐतिहासिक वेधशाला नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता की भागीदारी और अपनी बात रखने की आजादी का प्रतीक भी है। जिस जगह का निर्माण कभी ग्रहों और तारों का अध्ययन करने के लिए हुआ था, वही आज आम लोगों की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है।





