मध्य प्रदेश के पन्ना जिला अस्पताल की तस्वीरों ने सरकारी दावों पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। पहली ही बारिश ने अस्पताल की व्यवस्थाओं की ऐसी तस्वीर सामने रख दी, जिसने विकास और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों की हकीकत उजागर कर दी। अस्पताल परिसर में चारों ओर पानी भर गया, वार्डों और गलियारों तक पानी पहुंच गया और मरीजों के साथ उनके परिजनों को भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इलाज कराने पहुंचे लोगों के लिए अस्पताल किसी स्वास्थ्य केंद्र से ज्यादा “स्विमिंग पूल” जैसा नजर आया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर हर साल अस्पतालों के रखरखाव और मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने का दावा किया जाता है, तो पहली ही बारिश में पूरी व्यवस्था क्यों ध्वस्त हो गई? क्या मेंटेनेंस सिर्फ सरकारी फाइलों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित रह गया है? अगर समय रहते नालियों की सफाई, जल निकासी और भवनों की मरम्मत की गई होती, तो क्या मरीजों को इस तरह पानी में चलने को मजबूर होना पड़ता?

अस्पताल में जलभराव केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं है, बल्कि यह मरीजों की जान से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। अस्पतालों में पहले से ही संक्रमण का खतरा बना रहता है। ऐसे में गंदा पानी भरने से संक्रमण फैलने, मरीजों की स्थिति बिगड़ने और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। जिन लोगों को इलाज के लिए अस्पताल आना चाहिए था, वे खुद अव्यवस्था का शिकार बन गए।
विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि भाजपा सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे तो करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर बुनियादी सुविधाएं भी ठीक से उपलब्ध नहीं करा पा रही है। यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जिला अस्पताल की यह स्थिति है, तो जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि आखिर पैसा कहां खर्च हुआ और उसकी निगरानी किसने की? जवाबदेही तय किए बिना केवल दावे करने से हालात नहीं बदलेंगे।
यह घटना केवल पन्ना तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। हर साल मानसून आता है, फिर भी यदि अस्पताल पहली बारिश भी नहीं झेल पाते, तो यह व्यवस्था की योजना और क्रियान्वयन दोनों पर सवाल खड़े करता है।

अब सरकार और प्रशासन के सामने चुनौती केवल पानी निकालने की नहीं, बल्कि जनता का भरोसा वापस जीतने की भी है। यदि मेंटेनेंस पर वास्तव में करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं, तो उसका सार्वजनिक हिसाब सामने आना चाहिए। साथ ही पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यह तय होना चाहिए कि लापरवाही किस स्तर पर हुई और जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई होगी। आखिर जनता के टैक्स का पैसा जनता की सुविधा के लिए है, न कि केवल दावों और विज्ञापनों के लिए।





