नवरात्रि में गरबा पंडालों पर नो-एंट्री विवाद: धार्मिक आस्था, सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द पर छिड़ी नई बहस

देश में त्योहारों के आगमन के साथ ही सांस्कृतिक आयोजनों के स्वरूप और उनमें जन-सहभागिता को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। हाल ही में विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल जैसे संगठनों ने आगामी नवरात्रि उत्सव को लेकर सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इस नए फरमान के तहत महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात समेत कई राज्यों के गरबा और डांडिया आयोजकों से अपील की गई है कि वे गैर-हिंदुओं (विशेषकर मुस्लिम समुदाय) के प्रवेश पर रोक लगाएं। इसके लिए प्रवेश द्वारों पर पहचान पत्र (आधार कार्ड) की जांच करने, माथे पर तिलक लगाने और कलाई पर रक्षा सूत्र (कलावा) बांधने जैसे नियम अनिवार्य करने का सुझाव दिया गया है।

विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ताओं और प्रमुख पदाधिकारियों का कहना है कि यह निर्णय किसी वर्ग विशेष के खिलाफ नफरत फैलाने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि आस्था की रक्षा और एहतियाती उपाय के रूप में उठाया गया है। संगठनों का तर्क है कि गरबा केवल एक नृत्य या मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि माँ दुर्गा की आराधना का एक धार्मिक अनुष्ठान है। जो लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते, उनका इस धार्मिक उत्सव में भाग लेने का कोई औचित्य नहीं बनता। इसलिए आयोजकों से कहा गया है कि प्रवेश द्वार पर आधार कार्ड से पहचान सुनिश्चित की जाए और तिलक तथा कलावे के जरिए परंपराओं के निर्वहन को अनिवार्य बनाया जाए ताकि पंडालों के भीतर असामाजिक तत्वों या पहचान छुपाकर प्रवेश करने वालों पर अंकुश लगाया जा सके।

इस फरमान के सामने आते ही देश का राजनीतिक और सामाजिक माहौल पूरी तरह गर्मा गया है और विभिन्न राजनीतिक दलों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रियाएँ दी हैं। कांग्रेस, शिवसेना (UBT) और एनसीपी जैसे विपक्षी दलों का कहना है कि भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान और ‘विविधता में एकता’ की भावना को ऐसे कदमों से गहरा ठेस पहुँचता है। उनका आरोप है कि यह कदम त्योहारों के बहाने समाज में ध्रुवीकरण पैदा करने की कोशिश है। वहीं दूसरी ओर, कई बड़े गरबा आयोजकों का मानना है कि ऐसे प्रतिबंधों से आयोजनों के खुलेपन पर असर पड़ता है। यद्यपि सुरक्षा के लिहाज से पहचान पत्र की जाँच को व्यावहारिक माना जा रहा है, लेकिन धार्मिक कसौटियों पर लोगों को छांटना आयोजकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

भारत में नवरात्रि जैसे त्योहार हमेशा से सामाजिक सद्भाव, कला और सामुदायिक सहभागिता के प्रतीक रहे हैं। जहाँ एक तरफ सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं की शुचिता बनाए रखने के तर्क दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सार्वजनिक उत्सवों में पहचान आधारित बाड़ेबंदी देश के सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करेगी। त्योहारों के इस मौसम में प्रशासन और समाज दोनों के सामने कानून-व्यवस्था, सुरक्षा और आपसी सौहार्द बनाए रखने की दोहरी चुनौती खड़ी है।