जम्मू-कश्मीर की राजनीति में कश्मीर के मुद्दे को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के बयान के बाद अब पीडीपी प्रमुख और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का बयान चर्चा में है। 26 अक्टूबर को विलय दिवस के मौके पर महबूबा मुफ्ती ने केंद्र सरकार की नीतियों और जम्मू-कश्मीर के मौजूदा हालात पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोगों को साथ लेकर चलने के लिए उनके बीच भरोसा कायम करना जरूरी है। उनके बयान को घाटी के लोगों और केंद्र सरकार के बीच संबंधों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
महबूबा मुफ्ती ने आरोप लगाया कि अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर के लोगों की मुश्किलें बढ़ी हैं। उन्होंने सुरक्षाबलों की तैनाती, छापेमारी, युवाओं को हिरासत में लेने और लोगों पर पाबंदियां लगाए जाने जैसे मुद्दे उठाए। उनके मुताबिक, सरकार को केवल शांति और सामान्य स्थिति का दावा करने के बजाय लोगों की परेशानियों को समझना चाहिए। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में हालात बेहतर बनाने के लिए बातचीत और विश्वास बहाली पर जोर दिया।
महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय से जुड़ी ऐतिहासिक परिस्थितियों का भी जिक्र किया। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का हवाला देते हुए धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक मूल्यों की अहमियत बताई। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की नीति का जिक्र करते हुए कहा कि कश्मीर के मुद्दे का समाधान इंसानियत, लोकतंत्र और कश्मीरियत के आधार पर तलाशा जाना चाहिए।
उन्होंने देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले कश्मीरियों के साथ होने वाले व्यवहार पर भी चिंता जताई। महबूबा मुफ्ती के अनुसार, कश्मीरी लोगों को संदेह की नजर से देखना और उनके साथ भेदभाव करना देश के विभिन्न हिस्सों के बीच विश्वास को कमजोर कर सकता है। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि जम्मू-कश्मीर के लोगों की चिंताओं को गंभीरता से लिया जाए और उन्हें सम्मान के साथ देश की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास किए जाएं।
इससे पहले फारूक अब्दुल्ला के पाकिस्तान और कश्मीर से जुड़े बयान पर भी राजनीतिक विवाद हुआ था। अब महबूबा मुफ्ती की टिप्पणी के बाद जम्मू-कश्मीर की स्थिति, अनुच्छेद 370 और केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। दोनों नेताओं के बयानों ने एक बार फिर यह मुद्दा सामने ला दिया है कि जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति और लोगों का विश्वास हासिल करने के लिए राजनीतिक संवाद कितना जरूरी है।





