ईरान पर अमेरिकी दबाव बढ़ाने के लिए पाकिस्तान गलत विकल्प, रिपोर्ट में वॉशिंगटन की रणनीति पर सवाल

नई दिल्ली: ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए पाकिस्तान का सहारा लेना अमेरिका की रणनीतिक गलती साबित हो सकता है। एक रिपोर्ट में अमेरिकी नीति पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि पाकिस्तान के अपने आर्थिक, ऊर्जा और सुरक्षा संबंधी हित उसे ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाने से रोक सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान को ईरान पर अमेरिकी दबाव बढ़ाने का प्रमुख माध्यम बनाना वॉशिंगटन के लिए जोखिम भरा फैसला हो सकता है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका लंबे समय से आर्थिक प्रतिबंधों और अन्य उपायों के जरिए ईरान पर दबाव बनाता रहा है। ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन दोनों देशों के बीच भौगोलिक निकटता और आपसी जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ईरान के साथ तनाव बढ़ने से पाकिस्तान की सीमा सुरक्षा, व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि पाकिस्तान के लिए अमेरिकी हितों के अनुसार ईरान के खिलाफ कदम उठाना आसान नहीं होगा।

पाकिस्तान की ऊर्जा जरूरतें भी ईरान के साथ उसके संबंधों को प्रभावित करती हैं। ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना लंबे समय से अधूरी है। अमेरिकी प्रतिबंधों और आर्थिक चुनौतियों के कारण इस परियोजना को आगे बढ़ाने में मुश्किलें आती रही हैं। यदि पाकिस्तान ईरान के खिलाफ अधिक सख्त रुख अपनाता है, तो उसकी ऊर्जा योजनाओं और आर्थिक हितों पर दबाव बढ़ सकता है।ईरान के साथ तनाव बढ़ने का असर पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र पर भी पड़ सकता है।

सीमा के आसपास ईंधन के कारोबार और स्थानीय लोगों की आजीविका के कई साधन ईरान से जुड़े हैं। इसके अलावा, क्षेत्र के कुछ हिस्सों में बिजली की आपूर्ति के लिए भी ईरान महत्वपूर्ण है। ऐसे में दोनों देशों के बीच संबंध बिगड़ने से स्थानीय अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है।

पाकिस्तान की विदेश नीति पर चीन और सऊदी अरब के साथ उसके संबंधों का भी असर पड़ता है। चीन की ऊर्जा जरूरतें ईरान और खाड़ी क्षेत्र से जुड़ी हैं, जबकि सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के रक्षा संबंध महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में पाकिस्तान को अमेरिका की अपेक्षाओं और अपने क्षेत्रीय साझेदारों के हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। यही स्थिति ईरान के मामले में उसके लिए फैसले लेना मुश्किल बना सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी कूटनीतिक अहमियत बढ़ाने की कोशिश की है। हालांकि, पाकिस्तान की मध्यस्थता और ईरान पर दबाव बनाने की उसकी क्षमता दो अलग-अलग बातें हैं। रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में ईरान से अमेरिकी मांगों के अनुरूप रियायतें दिला सकता है।

कुल मिलाकर, रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए पाकिस्तान पर निर्भर रहना अमेरिका के लिए प्रभावी रणनीति साबित होना तय नहीं है। पाकिस्तान के अपने आर्थिक, ऊर्जा और सुरक्षा हित उसकी भूमिका को सीमित कर सकते हैं। हालांकि, रिपोर्ट में अमेरिकी नीति की आलोचना एक विश्लेषण के रूप में की गई है। इसे अमेरिकी सरकार की ओर से अपनी रणनीति को गलत मानने की आधिकारिक घोषणा नहीं माना जाना चाहिए।