चीनी सामान के आयात के जाल में कैसे फंसता चला गया भारत

भारत और चीन के बीच कारोबार पिछले कई दशकों में तेजी से बढ़ा है। चीन से आने वाले सस्ते और बड़ी मात्रा में उपलब्ध सामान ने भारतीय बाजार में अपनी मजबूत जगह बना ली। शुरुआत में कम कीमत और ज्यादा विकल्प के कारण उपभोक्ताओं को इसका फायदा मिला, लेकिन धीरे-धीरे भारत की कई इंडस्ट्री चीनी सामान और कच्चे माल पर निर्भर होती चली गईं।

भारत चीन से सिर्फ तैयार सामान ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, मोबाइल के कंपोनेंट्स, मशीनरी, ऑटो पार्ट्स, केमिकल और दवाओं में इस्तेमाल होने वाले एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स यानी API जैसे जरूरी सामान भी बड़े पैमाने पर आयात करता है। यही वजह है कि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

इस निर्भरता की सबसे बड़ी वजह चीन की कम लागत पर बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की क्षमता है। चीन में मजबूत सप्लाई चेन, सस्ती मैन्युफैक्चरिंग और बड़े उत्पादन नेटवर्क के कारण वहां से सामान मंगाना कई भारतीय कंपनियों के लिए घरेलू स्तर पर उत्पादन करने की तुलना में आसान और सस्ता रहा। इसका असर इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर उपकरण, मशीनरी और कई दूसरे क्षेत्रों में भी देखने को मिला।

हालांकि अब भारत इस निर्भरता को कम करने की कोशिश कर रहा है। सरकार घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने, इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल उत्पादन बढ़ाने और जरूरी कच्चे माल की देश में ही उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दे रही है। इससे भारत न सिर्फ आयात पर अपनी निर्भरता घटाना चाहता है, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी भूमिका भी मजबूत करना चाहता है।

दरअसल, चीन से होने वाले आयात को पूरी तरह रोकना आसान नहीं है, क्योंकि कई भारतीय उद्योग अभी भी वहां से आने वाले पार्ट्स और कच्चे माल पर निर्भर हैं। ऐसे में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती घरेलू उत्पादन, तकनीक और सप्लाई चेन को मजबूत करना है। अगर देश इन क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाता है, तो आने वाले समय में चीनी सामान पर निर्भरता कम करने के साथ भारत खुद एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है।