मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। 25 सितंबर 2026 को अधिवक्ता शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर SIR से जुड़े कुछ फैसले कथित तौर पर अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लेने का आरोप लगाया गया है। याचिका में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR, मतदाता जोड़ने-हटाने, Form 6 में बदलाव और चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़े कुछ फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। याचिका के अनुसार, नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच ऐसे कम से कम 14 मामलों में लिखित आपत्तियां दर्ज की गईं। हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि SIR से जुड़े फैसले आयोग की मंजूरी और सहमति से लिए गए थे।

PIL में मांग की गई है कि यदि किसी फैसले, दिशा-निर्देश या सॉफ्टवेयर में बदलाव को चुनाव आयुक्तों की बहुमत वाली सहमति के बिना लागू किया गया है, तो उसे असंवैधानिक और अमान्य घोषित किया जाए। याचिका में मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 के मूल स्वरूप को बहाल करने की मांग भी की गई है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने SIR के दौरान करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों की जांच के लिए स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग या Special Investigation Team (SIT) गठित करने की मांग की है। याचिका में CEC ज्ञानेश कुमार समेत कुछ अन्य अधिकारियों के खिलाफ कथित कर्तव्य उल्लंघन को लेकर कार्रवाई की मांग भी की गई है। फिलहाल यह मामला याचिका और उसमें लगाए गए आरोपों के स्तर पर है। सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को सही ठहराया है, ऐसा निष्कर्ष इस समय नहीं निकाला जा सकता। SIR से जुड़े निर्णयों और चुनाव आयोग की आंतरिक प्रक्रिया को लेकर आगे की न्यायिक कार्यवाही इस विवाद की दिशा तय करेगी।





