उत्तर प्रदेश की राजनीति में निषाद पार्टी के प्रमुख और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री संजय निषाद और प्रशासन के बीच टकराव अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। मामला गोंडा के निषाद पार्टी कार्यकर्ता और व्यापारी विनोद साहनी की मौत से जुड़ा है। हमले में गंभीर रूप से घायल विनोद को इलाज के लिए लखनऊ के KGMU लाया गया था, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। इसके बाद संजय निषाद ने लखनऊ में धरना देकर पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए और आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। मामले में पुलिस ने तीन नामजद आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जबकि पुलिस की कथित लापरवाही को लेकर तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित भी किया गया है।
मामला तब और ज्यादा चर्चा में आ गया, जब NDA सरकार का हिस्सा और खुद कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद संजय निषाद को प्रशासन के खिलाफ धरने पर बैठना पड़ा। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर एक मंत्री की शिकायत पर भी कार्रवाई के लिए संघर्ष करना पड़े, तो आम कार्यकर्ता और आम जनता की स्थिति क्या होगी। संजय निषाद ने सरकार से मामले में तेजी से कार्रवाई की मांग की और जरूरत पड़ने पर आंदोलन को आगे बढ़ाने की बात भी कही। वहीं, जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में विनोद साहनी की मौत लाठी से लगी चोटों के कारण होने की बात सामने आई है और गोली या चाकू से चोट के निशान नहीं मिले। इसके बावजूद शुरुआती पुलिस कार्रवाई और कथित लापरवाही को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
अब यह विवाद केवल एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं रह गया है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इसका राजनीतिक महत्व भी बढ़ गया है। निषाद पार्टी पूर्वांचल में निषाद समुदाय के बीच अपनी पकड़ का दावा करती है और संजय निषाद लगातार समुदाय से जुड़े मुद्दों को सरकार के सामने उठाते रहे हैं। ऐसे में प्रशासन के खिलाफ उनका खुलकर मोर्चा खोलना NDA के लिए भी एक अहम संकेत माना जा रहा है। वहीं, समाजवादी पार्टी के नेताओं का इस विरोध में शामिल होना मामले को और ज्यादा राजनीतिक बना रहा है। अब देखना होगा कि सरकार और संजय निषाद के बीच यह विवाद जल्द शांत होता है या फिर निषाद समुदाय के मुद्दे और प्रशासनिक कार्रवाई 2027 से पहले NDA के लिए एक बड़ा सियासी दबाव बन जाते हैं।




