‘मौलिक अधिकारों का हनन’, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का फैसला सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में चुनौती

नई दिल्ली: दिल्ली के प्रसिद्ध जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगहों की सूची से हटाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया है। दिल्ली पुलिस के इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाओं में कहा गया है कि इससे लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने और अपनी बात रखने के मौलिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। यह विवाद 12 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश के बाद सामने आया है।

जंतर-मंतर लंबे समय से दिल्ली में धरना-प्रदर्शन का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां लोग सरकार और सरकारी संस्थाओं तक अपनी शिकायतें पहुंचाने के लिए प्रदर्शन करते रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाकर तीन अन्य जगहों को प्रदर्शन के लिए चुना है। इनमें रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी मैदान शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में वकील स्वाति सिंह मलिक ने इस फैसले को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि प्रदर्शन स्थलों को दिल्ली के दूर-दराज के इलाकों में ले जाने से लोगों को परेशानी हो सकती है। साथ ही, प्रदर्शनकारियों के लिए संबंधित सरकारी अधिकारियों और संस्थानों तक अपनी आवाज पहुंचाना मुश्किल हो सकता है। याचिका के अनुसार, प्रदर्शन की जगह का सरकारी कार्यालयों के पास होना, आम लोगों की वहां तक पहुंच और मीडिया का ध्यान आकर्षित करना काफी महत्वपूर्ण है।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) का भी हवाला दिया गया है। अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को बोलने और अपनी बात रखने की आजादी देता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के इकट्ठा होने का अधिकार देता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जंतर-मंतर को हटाने से इन अधिकारों का इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता है। याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि नई जगहों के लिए प्रदर्शन से जुड़े जरूरी नियम और मानक प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होने से लोगों के सामने असमंजस की स्थिति बन सकती है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले का भी हवाला दिया गया है, जिसमें जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के अधिकार और उसे नियंत्रित करने के नियमों पर विचार किया गया था। वहीं, दिल्ली पुलिस ने बताया था कि वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों की पहचान सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के निर्देश के बाद की गई है। अब इस फैसले की कानूनी वैधता और नागरिकों के अधिकारों पर इसके असर को लेकर अदालतों में चुनौती दी गई है। मामले में अंतिम फैसला अदालतों की सुनवाई के बाद सामने आएगा।