चुनाव आयोग से राजनीति तक: पीयूष गोयल के आरोपों के बीच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों का इतिहास चर्चा में

भारत में चुनाव आयोग की भूमिका हमेशा अहम रही है। आयोग की जिम्मेदारी देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच चल रहे विवाद के बीच अब पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों के पुराने फैसलों और उनके रिटायरमेंट के बाद की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।

केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता पीयूष गोयल ने 13 अक्टूबर को कांग्रेस पर आरोप लगाया कि पार्टी ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों को चुनाव लड़ने का टिकट दिया और कुछ को सरकार में बड़े पदों पर नियुक्त किया। उन्होंने टीएन शेषन, एमएस गिल और आरके त्रिवेदी जैसे अधिकारियों के उदाहरण दिए। इन आरोपों के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि चुनाव आयोग के शीर्ष पद पर काम करने वाले अधिकारियों का राजनीति से जुड़ना कितना उचित है।

टीएन शेषन ने 1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में काम किया। उनका कार्यकाल चुनावी नियमों और आचार संहिता को सख्ती से लागू करने के लिए जाना जाता है। पद छोड़ने के बाद उन्होंने 1997 में राष्ट्रपति चुनाव लड़ा, लेकिन केआर नारायणन से हार गए। इसके बाद 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें गुजरात की गांधीनगर सीट से उम्मीदवार बनाया। इस चुनाव में उनका मुकाबला बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से हुआ, लेकिन शेषन को हार का सामना करना पड़ा।

एमएस गिल का मामला भी इस चर्चा का अहम हिस्सा है। वह 1996 से 2001 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। उनके कार्यकाल में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम के इस्तेमाल का विस्तार हुआ। साल 2000 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके बाद 2004 में वह कांग्रेस के टिकट पर पंजाब से राज्यसभा पहुंचे और 2008 में केंद्र सरकार में युवा मामले और खेल मंत्री बने। पीयूष गोयल ने उनके राजनीतिक सफर और सम्मान को लेकर सवाल उठाए हैं। हालांकि, इन घटनाओं का जिक्र होना अपने आप में किसी गलत काम का प्रमाण नहीं है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त आरके त्रिवेदी का उदाहरण भी सामने आया है। वह 1982 से 1985 तक इस पद पर रहे। रिटायरमेंट के करीब दो महीने बाद, फरवरी 1986 में उन्हें गुजरात का राज्यपाल नियुक्त किया गया। वहीं, नवीन चावला का मामला चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों से जुड़ा रहा। 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने उन पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाते हुए उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की थी। हालांकि, यह सिफारिश स्वीकार नहीं की गई और नवीन चावला बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त बने।

इस पूरे विवाद को समझने के लिए यह भी जानना जरूरी है कि चुनाव आयोग में फैसले कैसे लिए जाते हैं। पहले आयोग में केवल मुख्य चुनाव आयुक्त होता था, लेकिन 1993 में इसे तीन सदस्यीय संस्था बनाया गया। टीएन शेषन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी थी, लेकिन 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को फैसले लेने में समान अधिकार प्राप्त हैं। मतभेद होने पर बहुमत के आधार पर फैसला लिया जा सकता है।

वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर भी विवाद चल रहा है। विपक्ष ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर पर सवाल उठाए हैं। वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि उसके फैसले तय कानूनी प्रक्रिया के अनुसार लिए जाते हैं। अक्टूबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले में संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। अदालत का जवाब मांगना आरोपों को सही ठहराना नहीं है। ऐसे में पूरे मामले को राजनीतिक आरोपों के बजाय तथ्यों, कानूनी नियमों और निष्पक्ष जांच के आधार पर समझना जरूरी है।